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दो साल में उच्च शिक्षा के बजट में 60 करोड़ रुपए की कटौती

शिक्षा बजट में 60 करोड़ की कटौती का मामला।

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जयपुर . बजट से पहले हर वर्ष भले ही सरकार ने युवाओं और विद्यार्थियों को बैठा कर सुझाव लेने की औपचारिकता खूब की हो, लेकिन यह महज दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं रहा। सुझाव लेने के बाद सरकार ने उच्च व तकनीकी शिक्षा और युवाओं के लिए बजट घटाने का काम ही किया। प्रदेश में सरकारी कॉलेज शिक्षक बिना ही रहे, इंजीनियरिंग के कॉलेज अनुदान को तरसते रहे, खुद की बजट घोषणा से बने कॉलेजों को ही भवन नहीं मिल पाए। लेकिन विसंगतियों के बावजूद सरकार पिछले दो बजट में लगातार उच्च शिक्षा और युवा व खेल विभाग का बजट घटाती रही। गौर करने के बात यह भी रही कि शुरुआती दो वर्ष में इन विभागों के बजट में बढ़ोतरी हुई, लेकिन मंत्रिमंडल फेरबदल के बाद विभागों के मुखिया बदले, बजट का आकार घटता ही चला गया।

सराफ थे तो बढ़ा, किरण आईं तो घटा

वर्ष 2014-15 में जब कालीचरण सराफ उच्च शिक्षा मंत्री थे तो लगातार दो बार उच्च शिक्षा का बजट बढ़ते हुए 155 करोड़ रुपए से 417 करोड़ रुपए तक गया। लेकिन दिसंबर 2016 में मंत्रिमंडल फेरबदल के बाद किरण माहेश्वरी ने विभाग संभाला तो सरकार ने लगातार दो बार इसे घटाते हुए 357 करोड़ रुपए तक ले आई। एेसे ही तकनीकी शिक्षा में भी पिछले बार के 74 करोड़ रुपए के बजट आवंटन की तुलना में 58.71 करोड़ रुपए का ही प्रावधान किया गया।

जबकि बढ़ता रहा समग्र बजट

समग्र तौर पर शिक्षा क्षेत्र के लिए बजट का आकलन करें तो यह प्रावधान हर साल बढ़ते रहे हैं। शिक्षा क्षेत्र में 2014-15 में कुल बजट प्रावधान 817 9 .03 करोड़ रुपए था, जो 2018-19 में 16743.24 करोड़ रुपए हो गया। लेकिन इसमें उच्च शिक्षा सरकार की प्राथमिकता पर नहीं रही।

पैसा मिलता तो नहीं होते यह हालात...

-सरकारी कॉलेजों में शिक्षकों के तकरीबन 40 प्रतिशत पद रिक्त चल रहे हैं ।
-2014 की भर्ती अब तक पूरी नहीं हो सकी।
-करौली, धौलपुर और बारां में नए इंजीनियरिंग कॉलेज चार साल पहले खुले,लेकिन अब तक दूसरे कॉलेज भवनों में ही संचालित हैं।
-राजधानी के एक मात्र राजकीय कॉलेज पिछले पांच साल से उधार के भवन में ही चल रहा है।
-अलवर, भरतपुर, बांसवाड़ा और सीकर में नए विश्वविद्यालयों के खुद के भवन जमीन पर नहीं आए।

युवा और खेल भी हाशिए पर

बजट की आंकड़ेबाजी में सिर्फ उच्च शिक्षा ही नहीं, बल्कि खेल और युवा विभाग भी हाशिए पर रहा। 2016-17 तक जहां विभाग का बजट करीब 9 5 करोड़ रुपए था, वहीं लगातार दो साल की गिरावट आने के साथ इस वर्ष का बजट प्रावधान सिर्फ 70.34 करोड़ रुपए ही रह गया।