जयपुर। देश के अलग-अलग क्षेत्रों के नाटक और संवाद प्रवाह में होने वाली चर्चा के साथ भारत रंग महोत्सव भारंगम का रंग जयपुर वासियों पर चढ़ रहा है। जेकेके में गुरुवार को है सनम तोम्बा के निर्देशन में मणिपुरी नाटक ‘ईमा ननगी नतम पाकता.ऑन योर बॉसम मदर अर्थ’ का मंचन हुआ। वहीं संवाद प्रवाह के पहले सत्र में साहित्यकार नंद भारद्वाज और नाट्य निर्देशक गोपाल आचार्य के साथ चर्चा में कई विषयों पर प्रकाश डाला गया।
महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर विचार जरूरी
संवाद प्रवाह को सूत्रधार ईश्वर दत्त माथुर ने आगे बढ़ाया। इस दौरान नाटक भोपा भैरूनाथ की पृष्ठभूमि को आधार बनाकर कहानी, ग्रामीण अंचलों की लोक संस्कृति, महिलाओं की स्थिति व सामाजिक मान्यताओं पर मंथन किया गया। गोपाल आचार्य ने कहा कि भोपा भैरूनाथ में समय के साथ गीतों व दृश्यों में बदलाव भी किया गया, बेहतर प्रस्तुति के लिए परिवर्तन करने में गुरेज नहीं करना चाहिए। बकौल गोपाल आचाय, होश पूर्वक प्रकृति के साथ रहना ही लोक है, ग्रामीण परिवेश को करीब से जानकर वहां के जीवन को रंगमंच पर लाया जा सकता है। साहित्यकार नंद भारद्वाज ने कहा कि एक लेखक को समस्या के भीतर की समस्या को समाज के सामने रखने का प्रयास करना चाहिए,जहां तक हर कोई नहीं पहुंच पाता है। उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर विचार जरूरी है। अत्याचार होने के बावजूद परिवार के लोगों भी उनका साथ नहीं देते हैं।
मां की गोद को ना पहुंचे चोट
इधर, नाटक ईमा ननगी नतम पाकता की बात करें तो शीर्षक के अर्थ से शुरुआत करनी होगी। मणिपुरी के इस शब्द का अर्थ है मां की गोद में। श्मणिकरो होनबाश् नामक मुख्य पात्र के जरिए यह दिखाने का प्रयास किया गया कि जिस मां की गोद यानी देश में हमारा जीवन बीत रहा है उसे किस तरह से भ्रष्टाचार व अन्य सामाजिक बुराइयों से चोट पहुंचाई जा रही है। अनाथ बालक मणिकरो होनबा बहुत होशियार व मेहनती होता है। भ्रष्टाचारियों की चाल के चलते हर परीक्षा में टॉप करने के बावजूद मणिकरो होनबा के सपने पूरे नहीं हो पाते हैं। भावनाओं के आवेश में उससे एक भ्रष्टाचारी की हत्या हो जाती है। लंबी जेल काटने के बाद वह अपनी बदले की आग को दबाकर बदलाव की लौ जलाता है। वह युवा पीढ़ी की सोच को सकारात्मक दिशा देते हुए अपनी क्षेत्र को सामाजिक बुराइयों से मुक्त करने में सफलता हासिल करता है। कलाक्षेत्र मणिपुर के कलाकार भाषाई सीमा को तोड़ते हुए यह संदेश दर्शकों तक पहुंचाने में सफल रहे कि जिस मां की गोद में हम फल फूल रहे हैं उसे जकडऩे वाले बंधनों को तोडऩा होगा। बता दें कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह नाटक अपनी छाप छोड़ चुका है।