4 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

मेरी खबर

icon

प्लस

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

जहां शराबबंदी का आंदोलन, वहीं शराब फैक्ट्री को मंजूरी

बांसवाड़ा-बारां: विस चुनाव से ठीक पहले भाजपा ने दिया था विशेष पैकेज, गनोड़ा और गुवाड़ी-माजहरी में अनाज आधारित कारखाना लगाने की तैयारी

2 min read
Google source verification
baran

जहां शराबबंदी का आंदोलन, वहीं शराब फैक्ट्री को मंजूरी

शादाब अहमद/जयपुर. आदिवासी इलाकों में गरीबी और परिवारों में बिखराव का बड़ा कारण शराब को माना जाता रहा है। इसके चलते बांसवाड़ा में शराबबंदी को लेकर आदिवासी महिलाएं करीब एक साल से आंदोलन चला रही हैं। सरकार ने इनकी तो सुनी नहीं, बल्कि बांसवाड़ा और बारां जिले में शराब की फैक्ट्री खोलने की मंजूरी देने के साथ उन पर रियायतों की बौछार कर दी। प्रदेश में शराबबंदी को लेकर लगातार विरोध बढ़ रहा है। खासतौर पर आदिवासी बहुल बांसवाड़ा जिले में शराब से बर्बाद हुए परिवारों के चलते पिछले एक साल से महिलाएं आंदोलन कर रही है। भाजपा ने सत्ता में रहते हुए आदिवासी बहुल बांसवाड़ा जिले के गनोड़ा और बारां जिले के शाहबाद क्षेत्र के गुवाड़ी-माजहरी में अनाज आधारित शराब बनाने की फैक्ट्री को मंजूरी दे दी। विधानसभा चुनाव की अधिसूचना से करीब तीन महीने पहले 23 जुलाई 2018 को दोनों ही फर्मों को विशेष पैकेज भी दे दिए।



पैदा होता है भरपूर मात्रा में अनाज
बांसवाड़ा और बारां दोनों ही जिले कृषि प्रधान हैं। दोनों में ही भरपूर मात्रा में अनाज की पैदावार होती है। वहीं इनकी प्रोसेसिंग या स्टोरेज के माकूल इंतजाम नहीं होने के चलते किसानों को उनकी उपज को औने-पौने दाम में बेचना मजबूरी है। सरकार ने फसलों की प्रोसेसिंग या स्टोरेज बढ़ाने के लिए कोई काम नहीं किया। इसके उलट शराब फैक्ट्री को मंजूरी दे दी।

आदिवासी इलाका ही क्यों?
बांसवाड़ा जिले में अधिकांश आबादी आदिवासियों की है। जहां शराब का उपयोग बड़ी मात्रा में किया जाता है। इसमें वैध शराब बिक्री के अलावा हथकढ़ शराब का भरपूर उपयोग होता है। हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश से प्रतिबंधित शराब लाकर बेची जाती है। वैध शराब की ब्रिकी में बांसवाड़ा जिला सबसे आगे रहता आया है। वित्तीय वर्ष 2017-18 में 127 करोड़ रुपए की आय अर्जित कर बांसवाड़ा शराब बिक्री में दूसरे स्थान पर था। वहीं इस साल भी सरकार को इस जिले से 140 करोड़ रुपए मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही अनाज उत्पादन के साथ पानी की कमी नहीं है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर आदिवासी इलाकों को शराब उत्पादन के लिए मुफीद माना जा रहा है।

रोजाना 170 किलोलीटर तक उत्पादन क्षमता
बारां की फैक्ट्री में 170 किलोलीटर और बांसवाड़ा में 90 किलोलीटर प्रतिदिन शराब उत्पादन की क्षमता तय की गई है। दोनों की लागत करीब डेढ़ सौ करोड़ रुपए से अधिक बताई जा रही है। दोनों ही फैक्ट्री में स्किल्ड और नॉन स्किल्ड 100-100 लोगों को रोजगार देने का दावा किया जा रहा है।

स्थानीय निवासी का कहना है
हम क्षेत्र की महिलाएं पिछले कई माह से शराब के अड्डे बंद करवाने के लिए संघर्षरत हैं, लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिल रही है। हमने अपने स्तर पर कई अड्डे बंद भी करवाए हैं। पुलिस प्रशासन को सहयोग करना होगा तभी शराब से उजड़ते परिवारों की स्थिति में सुधार आएगा। - कमला देवी