
दो कार सेवाओं में हिस्सा लिया...विवादित ढांचा गिरते देखा, अब राम मंदिर बनते देख रहा हूं: घनश्याम तिवाड़ी
अयोध्या में 22 जनवरी को रामलला का प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव होगा। राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवाड़ी उन चुनिंदा लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने दोनों कार सेवाओं में हिस्सा लिया। दूसरी बार तो उन्होंने राजस्थान से गए कार सेवकों के जत्थे की अगुआई भी की थी। पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा में भी उन्होंने योगदान दिया। जब अयोध्या में विवादित ढांचा तोड़ा गया, उस समय के फायर ब्रांड नेताओं की क्या मंशा थी और जब विवादित ढांचा ढहाया गया, उसके बाद कैसे सियासी तस्वीर बदली? उस समय देश का माहौल कैसा था? इन सभी पर तिवाड़ी ने राजस्थान पत्रिका से खास बातचीत की। उन्होंने कहा कि जब आडवाणी की रथयात्रा राजस्थान में आई थी, उसमें भी योगदान दिया था। छोटी चौपड़ पर बैठक हुई। यात्रा के अगले दिन जयपुर में दंगे हो गए। दंगों की जांच के लिए टिबरेवाल आयोग को जांच सौंप दी। आयोग की रिपोर्ट में दोष सिद्ध नहीं हुए।
सवाल: राम मंदिर के लिए दो कार सेवा हुईं। एक रथ यात्रा निकाली गई। आप इनमें आपकी भूमिका क्या रही?
जवाब: पहली कार सेवा 1990 में हुई। राजस्थान से जाने वाले लोगों को आगरा में रोककर जेल में डाला जा रहा था। गांव के लोगों का सहयोग से हम जैसे तैसे अयोध्या तक पहुंचे। उप्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कार सेवकों पर गोली चलवाई थीं। इसके बाद हम राजस्थान लौटे। दूसरी बार 1992 में कार सेवा हुई। इसी कार सेवा में विवादित ढांचे को ढहा दिया गया था। इसमें शामिल होने के लिए हम पहले जत्थे को लेकर गोविंददेवजी मंदिर से तीन दिसम्बर को रवाना हुए। चार दिसम्बर को अयोध्या पहुंच गए। वहां ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं थी। सड़कों पर लोग रह रहे थे। लकडिय़ां जलाकर सर्दी से बचने का प्रयास कर रहे थे।
सवाल: कार सेवकों के पास विवादित ढांचे को गिराने की जानकारी थी या फिर वहां के माहौल को देखकर कार सेवक ढांचे पर चढ़ गए थे।
जवाब: पांच दिसम्बर को सुबह कार सेवकों की बैठक हुई। इसमें वरिष्ठ भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी, विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल, संघ के सर कार्यवाह शेषाद्री से लेकर उमा भारती, शिरीश चंद दीक्षित, साध्वी ऋतंभरा मौजूद थीं। बैठक में तय हुआ कि कि छह दिसम्बर को सुबह कुछ लोग सरयू नदी से एक मुट्ठी मिट्टी और कुछ लोग एक लोटा पानी लेकर राम चबूतरे को धोएंगे। यही सेवा होगी। जब सरयू नदी से कार सेवक आ रहे थे। उस समय सड़क के दोनों ओर पीएसी के जवान तैनात थे।कार सेवकों को देखकर पीएसी के जवानों ने कहा...कायरों कार सेवा करने आए हो और मिट्टी और पानी लेकर जा रहे हो।इस तरह के बयानों से लोगों का गुस्सा बढ़ गया। देखते ही देखते कुछ लोग विवादित ढांचे पर चढ़ गए। तोडफ़ोड़ करने लगे। एक के बाद दूसरा और फिर तीसरा गुम्बद ढहा दिया। इस दौरान रात हो गई।
सवाल: जब विवादित ढांचा ढहाया गया, उस समय बड़े नेता वहीं थे। उनकी भूमिका क्या थी?
जवाब: नेताओं का मंच दो भागों में बंटा था। एक ओर आडवाणी, जोशी और शेषाद्री थे। ये लोग ढांचे को नहीं तोडऩे की बात कह रहे थे। दूसरे मंच पर ऋतंभरा, पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती और धर्मेंद्र आचार्य थे। ये कह रहे थे कि हनुमान जी के भक्त हो तो ढांचे पर चढ़ो और तोड़ दो।
सवाल: जिस दौरान यह सब घटनाक्रम हो रहा था, उस समय अफवाहें भी फैल रही होंगी। उनसे कैसे निपटते थे।
जवाब: ढांचे को ध्वस्त किया जा रहा था। उस समय सूचना आई कि लखनऊ से सीआरपीएफ के जवान रवाना हो गए हैं। जल्द ही यहां पहुंचेंगे। अयोध्या में सीआरपीएफ के जवान प्रवेश न करें। इसके लिए कार सेवकों, स्थानीय लोगों और पुलिस ने मिलकर भारी भरकम पेड़ों को काटकर सडक़ों पर डाल दिया।
सवाल: विवादित ढांचा गिराने से लेकर रामलला को विराजमान कराने तक आपका और राजस्थान का क्या योगदान रहा?
जवाब: जिस समय ढांचा गिर रहा था, उस समय मंदिर के पुजारी भगवान राम, सीता और लक्ष्मण की मूर्तियों को लेकर चले गए। विवादित ढांचा गिराने के बाद जब विश्व हिन्दू परिषद ने अस्थाई मंदिर निर्माण की बात कही। इसकी जिम्मेदारी राजस्थान प्रांत को मिली। हम सभी ने ईंट, पत्थर और तिरपाल लगाई और रात तीन बजे मूर्तियों को विराजमान किया।
सवाल: दंगे बढ़ रहे थे। कफ्र्यू लग गया था। अयोध्या से वापस जयपुर आना कैसे हुआ। उस समय रास्ते में कैसा माहौल मिला।
जवाब: माहौल तनावपूर्ण था। आठ सौ रुपए में फोर सीटर गाड़ी किराए पर की। उसमें आठ लोग बैठकर लखनऊ पहुंचे। रास्ते में गाड़ी पर पथराव हुआ और उसके शीशे टूट गए। लखनऊ से ट्रेन में सवा हुए और जयपुर पहुंचे। ट्रेन पर भी कई जगह पथराव हुआ। जयपुर में कफ्र्यू लगा था। गांधी नगर रेलवे स्टेशन उतरे। पुलिस की निगरानी में घर पहुंचे।
सवाल: विवादित ढांचा गिराने के बाद राजनीति में क्या बदलाव आया?
जवाब: विवादित ढांचे को गिराने की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने ले ली थी। उन्होंने पुलिस और पीएसी को कार सेवकों पर गोली न चलाने के आदेश दिए थे। ढांचा गिरने के बाद उन्होंने भारत सरकार को जो पत्र लिखा, उसमें घटना की जिम्मेदारी ली और कहा कि इसके लिए मैं जिम्मेदार हूं। राजस्थान में भी इस घटना के बाद भैंरों सिंह शेखावत की सरकार को बर्खास्त कर दिया। चुनाव हुए और भाजपा की फिर सरकार बनी।
Published on:
15 Jan 2024 05:08 pm
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