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कहानी संग्रह ‘वह अमर कृति’: अब्दुल और मेरा क्या रिश्ता था!

https://www.patrika.com/jaipur-news/satyanarayan-book-sub-kuchh-jeevan-4792540/   लेखक भागचंद गुर्जर के हालिया प्रकाशित कहानी संग्रह ‘वह अमर कृति’ में नजर आएंगे सिंधु सभ्यता के अवशेष भी और छह दिसंबर की पृष्ठभूमि में रची-बसी एक कहानी भी, जो यकीन दिलाती है कि इंसानियत का रिश्ता तब भी निभाया लोगों ने...

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जयपुर

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Uma Mishra

Jul 13, 2019

जयपुर. ‘वह अमर कृति’ भागचंद गुर्जर का दूसरा कहानी संग्रह है, जो हाल ही प्रकाशित हुआ है। जब आप इस संग्रह की कहानियों में प्रवेश करने से पहले भूमिका से गुजरते हैं, तो लेखक की साफगोई आपको अपनी गिरफ्त में ले लेती है।
लेखक कहते हैं कि उनकी कहानियों में भाषाई चमत्कार नहीं, नई शैली का जादू भी नहीं, जो है, बस कथ्य है, उनका वैविध्य है। तभी तो उनकी कहानियां सिंधु घाटी से होती हुई, उस तालकटोरा तक जा पहुंचती हैं, जहां जिंदगी से हारे हुए लोग डूब जाना चाहते हैं।
कलमकार मंच से आए इस संग्रह में पंद्रह कहानियां हैं, जो आपको एक-दूसरे से गुजरती हुए लगेगी भी और नहीं भी, ऐसा इसलिए कि उनके विषय जरूर विविध है, लेकिन हर कहानी तेजी से घटित होती नजर आती है, पर पाठक को यह यकीन भी दिलाती है कि ये घटनाएं उसके आस-पास की ही है।

एक कहानी इंसानियत की….
इस संग्रह की एक कहानी है, ‘इंसानियत का रिश्ता’। मौजूदा समय को देखते हुए बेहद जरूरी-सी कहानी लगती है और लेखक ने जिस तरह से दंगे और उसके बाद कफ्र्यू की इस घटना को बयां किया है, उससे यही लगता है कि यह महज कहानी नहीं, सच्ची घटना है।
छह दिसंबर की घटना से फिजां में घुले सांप्रदायिक तनाव से निकलकर गुलाबी नगर ने जिस तरह फिर से अपनी महक कायम की, उससे यही लगता है कि इंसानियत के रिश्ते अभी यहां कम नहीं हुए हैं, उसी कहानी से एक अंश साहित्य प्रेमियों और अमन पसंद लोगों के लिए-

कहानी का अंश…

सुबह के सात बज गये थे। हम दफ्तर वाले कमरे में आ गये थे, ताकि आवाजें साफ सुनाई दे सकें। मुझे ऐसा लगा जैसे कुछ लोग बाहर सडक़ पर ही बातें कर रहे हों। मैंने शटर के छेद में से देखा, वे पुलिस वाले थे। मैंने ताला खोला और हिम्मत करके अब्दुल की सहायता से धीरे-धीरे शटर ऊपर किया। शटर की आवाज से ही उनका ध्यान हमारी ओर हो गया। हवलदार चिल्लाया ‘‘कौन है! क्या करता है? मरना है क्या! देखता नहीं शहर में कफ्र्यू लगा है।’’

मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘हवलदार साहब हम रात भर से यहाँ भूखे पड़े हैं। घर की चिंता सता रही है। कृपा करके हमें घर भिजवा दीजिए।’’
एक सिपाही बोला, ‘‘ठीक है अभी भिजवा देंगे, गाड़ी आने दो। फिलहाल तुम शटर बन्द कर लो। गाड़ी आने पर हम तुम्हें बाहर बुलवा लेंगे।’’
साढ़े आठ बजे के लगभग वहाँ एक खुली जीप आई उन्होंने हमको बाहर बुलवा लिया। मैंने झटपट शटर को बन्द करके ताला लगाया। फिर हम दोनो जीप में बैठ गये। जीप में हमारे साथ बैठे हवलदार ने पूछा, ‘‘दोनों एक ही जगह जाओगे या अलग-अलग?’’

अब्दुल मेरी ओर देखने लगा। मैंने जल्दी से कहा, ‘‘एक ही जगह जायेंगे।’’ और अपने घर का पता बता दिया। जब जीप शहर के बाजारों से गुजर रही थी तो सिवाय जीप की आवाज के अन्य कोई आवाज नहीं आ रही थी। कहीं-कहीं कुछ जली-अधजली दुकानें भी नजर आई। शहर की गुलाबी रंगत उड़ी-उड़ी सी लगी। दूर मकानों की छतों पर कुछ परछाइयाँ सी डोलती दिख रही थी, बाकी सब जगह सन्नाटा पसरा था।

जीप हमें बहुत जल्दी घर ले आई। मेरा घर बाहरी इलाके में था, यहाँ उतना ज्यादा खतरा नहीं था। घर में दाखिल होते ही मैंने चैन की सांस ली। घरवालों की भी मुझे देखकर जान में जान आई। उनके चेहरों से लग रहा था कि उन्होंने भी रात आँखों में ही गुजारी थी। उधर अब्दुल अभी भी शायद डर रहा था। मैंने उसे समझाया कि तुम्हें यहाँ बिल्कुल भी घबराने की आवश्यकता नहीं है। मेरे परिवार वालों को भी मैंने उसके बारे में बताया तो उन्होंने भी पूरा सहयोग दिया।

तीन चार दिन जब तक कफ्र्यू रहा, अब्दुल हमारे ही साथ रहा। उसे कोई परेशानी नहीं हुई। अब भी जब कभी वह कागज डालने आता है तो मुझे दंगे और कफ्र्यू वाली वह रात याद आ जाती है। और मैं सोचने लगता हूँ कि अब्दुल और मेरा क्या रिश्ता था?