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मीटिंग का न्यू डेस्टिनेशन बने कैफे…युवा चाय पी रहे, कुछ ऑफिस की तरह कर रहे काम

राजधानी के कैफे कल्चर अब बदला हुआ नजर आने लगा है। कोरोनाकाल के वर्क फ्रॉम होम और को-वर्किंग स्पेस की वजह से कैफे कल्चर लोगों को रास आ रहा है। राजधानी में 50 से अ​धिक कैफे हैं।

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जयपुर। राजधानी के कैफे कल्चर में अब मीटिंग का तडक़ा लग रहा है। इतना ही नहीं, वर्क फ्रॉम होम और को-वर्किंग स्पेस में बैठकर काम करने वाले युवा इन कैफे में आकर कई घंटे बिता रहे हैं। खास बात यह है कि यहां समय की कोई पाबंदी नहीं है। लोग दो से तीन घंटे रहते हैं। इस दौरान चाय पीते हैं, नाश्ता करते हैं और कई दौर की बात हो जाती है।

दरअसल, कोरोनाकाल के बाद वर्क फ्रॉम होम और को-वर्किंग स्पेस का दौर आया है। जो लोग वर्क फ्रॉम होम या फिर को-वर्किंग का हिस्सा हैं, वे इन कैफे में आकर मीटिंग करना पसंद करते हैं। यही वजह है कि इनका चलन शहर में तेजी से बढ़ रहा है। नए कॉन्सेप्ट के साथ शहर में कैफे खुल रहे हैं। इनसे न सिर्फ राजधानी की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, बल्कि कई लोगों को नौकरियां भी मिल रही हैं। शहर के सी-स्कीम, बनी पार्क, सिविल लाइन्स, वैशाली नगर से लेकर विद्याधर नगर, राजापार्क और मालवीय नगर में इस तरह से कैफे नजर आ जा जाएंगे।

पांच मिनट में पांच रुपए की चाय का दौर खत्म
-इन कैफे में ज्यादातर चाय के हैं। हालांकि, इन कैफे में नाश्ता का भी विकल्प होता है, लेकिन यहां चाय पांच रुपए में नहीं बल्कि 90 रुपए में मिलती है। कोई चाय के साथ बिस्किट देता है तो कोई पापड़ खिलाता है। खास बात यह है कि यहां युवाओं को 350 रुपए तक की चाय भा रही है। पहले की बात करें तो लोग चाय की दुकान पर सिर्फ चाय पीने आते थे और पांच मिनट में चाय पीकर चले जाते हैं।

ऐसे समझें शहरी अर्थव्यवस्था का गणित
-50 कैफे ऐसे हैं राजधानी में जिन पर रहती है अच्छी खासी फुटफॉल
-500 से लेकर 800 रुपए तक खर्च करते हैं यहां आने वाले लोग
-100 कैफे ऐसे हैं, जिनमें प्रति कैफे करीब 50 लोगों की रहती है आवाजाही

इसलिए आ रहे लोग
-मिड प्वॉइंट मिल जाता है। ऑफिस में स्पेस कम होता है तो यहां आराम से बैठकर चर्चा कर लेते हैं।
-चाय के साथ-साथ यहां बेकरी आइटम्स से लेकर अन्य डिशेज का भी लुत्फ उठाते हैं।
-संगीतमय माहौल और खाने की अच्छी गुणवत्ता इन कैफे की यूएसपी होती है।

बड़ी संख्या में युवा आते हैं। अब समय की कोई पाबंदी नहीं रहती। ज्यादा देर तक बैठने से ग्राहक खर्च भी करता है। चाय के साथ-साथ नाश्ता और कई लोग तो खाना भी खाकर जाते हैं।
-राहुल मूंदड़ा, कैफे संचालक

शुरुआत में ग्राहकों के लिए कैफे में स्पेस कम था। ग्राहकों ने डिमांड की तो हमने बढ़ा दिया। उससे फायदा हुआ। कई लोग तो नियमित रूप से आकर काम करते हैं।
-राकेश उपाध्याय, कैफे संचालक