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जलवायु परिवर्तन के लिए भारत इसलिए नहीं जिम्मेदार

Climate Change : दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों को लेकर चिंता की स्थिति बनी हुई है..  

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जलवायु परिवर्तन के लिए भारत इसलिए नहीं जिम्मेदार

नई दिल्ली/जयपुर
climate change : दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों को लेकर चिंता की स्थिति बनी हुई है। धरती का तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पिघल रहे हैं। इन स्थितियों के बीच शुक्रवार को केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने लोकसभा में यह घोषणा कर साफ कर दिया है कि भारत जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार नहीं है। इसके पीछे उन्होंने तर्क भी रखे। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने कहा कि भारत में प्रतिव्यक्ति कार्बन उत्सर्जन दो टन से ज्यादा नहीं है, जबकि अमेरिका, चीन, यूरोप में यह उत्सर्जन का प्रतिशत भारत से कहीं ज्यादा है। वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन पर तीसरे दिन भी शुक्रवार को लोकसभा में चर्चा चली।

इस मुद्दे पर विस्तृत जवाब देने से पहले, जावड़ेकर ने पहली बार जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के बीच अंतर को परिभाषित भी किया। उन्होंने कहा कि कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन बढ़ने की वजह से जलवायु परिवर्तन होता है। जावड़ेकर ने कहा कि वायुमंडल में करीब 100 सालों से कार्बन डाइऑक्साइड मौजूद है, लेकिन प्रदूषक वायुमंडल में थोड़े समय के लिए पाए जाते हैं और फिर गायब हो जाते हैं।

इस वजह से भी बढ़ा उत्सर्जन
आपको बता दें कि जावड़ेकर ने यह भी कहा कि कोयले और बेरंग गैस के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड गैस का उत्पादन बढ़ा है। जिसका शुष्क हवा की तुलना में लगभग 60 प्रतिशत अधिक घनत्व है। इस गैस ने पृथ्वी से उत्पन्न गर्मी को पर्यावरण में ऊपर जाने से रोक दिया है। इसकी का परिणाम है कि तापमान बढ़ने से गर्मी बढ़ रही है। यह गर्मी ही जलवायु परिवर्तन का सबसे प्रमुख कारण है। लोकसभा में केन्द्रीय मंत्री जावड़ेकर ने कहा कि भारत जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार नहीं है, क्योंकि देश का प्रतिव्यक्ति कार्बन उत्पादन दो टन से अधिक नहीं है। जावड़ेकर ने दूसरे देशों का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका में 16 टन, यूरोप में 13 टन और चीन में 12 टन काबर्न डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हो रहा है। जो कि भारत में हो रहे कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन से कई गुना ज्यादा है।

दुनियाभर में चिंता की स्थिति
आपको बता दें कि क्लाइमेट चेंज को लेकर दुनियाभर में चिंता है। कई देश अपने यहां कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं। ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा दिया जा रहा है। जर्मनी में कोयले और पेट्रोल की जगह सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम किया जा सके। जर्मनी ने पिछले सालों में जीवाश्म ऊर्जा पर निर्भरता कम करने और अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने का फैसला किया है।

क्लाइमेंट इमरजेंसी की स्थिति
दरअसल, दुनियाभर में इस वक्त जलवायु परिवर्तन मुद्दे को लेकर गंभीर स्थिति बनी हुई है। विश्वभर क्लाइमेट चेंज से आनेवाली परेशानियों को लेकर चिंतित है। इस साल भारत से लेकर अमरीका तक और ऑस्ट्रेलिया से लेकर जर्मनी तक हर जगह यह मुद्दा प्रदर्शनों में भी तब्दील होता दिखा है। यही कारण है कि ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने इस बार 'Climate Emergency' को 2019 का वर्ड ऑफ द ईयर चुना है।