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विदेशों से रंगीन रत्न की रफ मंगाकर खपा रहे कालाधन, इसलिए खोजा नया रास्ता

रंगीन रत्नों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर जयपुर के इस व्यवसाय का उपयोग कालाधन खपाने में भी किया जा रहा है।

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जगमोहन शर्मा/ जयपुर। रंगीन रत्नों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर जयपुर के इस व्यवसाय का उपयोग कालाधन खपाने में भी किया जा रहा है। आयकर विभाग की केंद्रीय खुफिया एजेंसी राजस्व आसूचना निदेशालय (डीआरआई) ने हाल ही विदेशों से आयातित रंगीन रत्न की रफ पकड़ी हैं, जिनमें माल की कीमत वास्तविकता से कई गुना ज्यादा बताई गई है।

इससे यह आशंका जताई जा रही है कि ओवरवैल्यू कर कहीं कालाधन तो विदेशों में नहीं भेजा जा रहा हो। जयपुर के कारोबारियों की इस 22 करोड़ रुपए की खेप को डीआरआई ने कस्टम विभाग को सौंप दिया है। 15 दिन बाद भी खेप की दावेदारी के लिए कोई नहीं आया है।

एेसे मामले सामने आने के बाद डीआरआई और कस्टम विभाग अब पहले से ज्यादा सतर्क को गए हैं और रत्नों के आयात-निर्यात के कंसाइन्मेंट्स की वैल्यू को बराबर चैक कर रहे हैं। तंजानिया से बड़ी मात्रा में तंजेनाइट की रफ आयात की जाती है।

क्या है ओवरवैल्यू का खेल
दरअसल हवाला कारोबारी विदेशों से रंगीन रत्नों की रफ ओवरवैल्यू में खरीद रहे हैं। रफ की कीमत पांच करोड़ है, तो इसे सात करोड़ में आयात किया जा रहा है। इस पर कोई ड्यूटी भी नहीं है, एेसे में इसे आयात करना सस्ता पड़ रहा है।

इसलिए खोजा नया रास्ता
सरकार ने रेरा (रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण) और बेनामी संपत्ति कानून को लाकर रियल एस्टेट में खप रहे कालेधन पर पूरी तरह लगाम लगा दी है। एेसे में हवाला कारोबारियों ने कालाधन खपाने का नया रास्ता खोजा है।

4000 करोड़ रुपए का सालाना कारोबार
राजस्थान में रंगीन रत्न का सालाना बाजार करीब 4000 करोड़ रुपए का है। हालांकि पिछले
एक साल में इसमें गिरावट देखने को मिली है, जिसमें सबसे बड़ा कारण यूएई से मांग कम होना है। यूएई सरकार ने रंगीन रत्नों पर पांच फीसदी टैक्स लगा दिया है, जिसके चलते डिमांड में कमी आई है। कुल मिलाकर जवाहरात के निर्यात में 8.67 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है।


रंगीन रत्न की रफ के आयात-निर्यात में ओवरवैल्यू और डीवैल्यू के मामले सामने आए हैं। हालांकि अभी जांच चल रही है। हाल ही में डीआरआई द्वारा पकड़े गए लगभग 22 करोड़ के एक कंसाइन्मेंट को जांच के लिए रखा गया है। संबंधित कारोबारी चाहे तो प्रोविजनल रिलीज की मांग कर सकते हैं।
-डॉ. सुभाष अग्रवाल, कस्टम आयुक्त