
सुल्या (दक्षिण कन्नड़). केंद्र सरकार की सातवीं मसौदा अधिसूचना और कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट ने पश्चिमी घाट की तलहटी में बसे गांवों में एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। दक्षिण कन्नड़ जिले के सुल्या तालुक के अरंतोडु ग्राम पंचायत क्षेत्र में आने वाला तोडिक़ाना इसका उदाहरण है। घने जंगल, पहाड़, घाटियां, झरने और सुपारी के बागानों से घिरा यह गांव प्राकृतिक संपदा से समृद्ध है, लेकिन यहां के लोगों के सामने कृषि संकट, सडक़ और बुनियादी सुविधाओं की समस्याएं भी कम नहीं हैं।तोडिक़ाना के ग्रामीणों का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर उनके घर, खेती, सडक़ और अन्य मूलभूत सुविधाओं पर ऐसी पाबंदियां नहीं लगनी चाहिए, जिससे उनका जीवन ही संकट में पड़ जाए।
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Bसुपारी की खेती पर ‘पीली बीमारी’ की मारB
करीब 600 घरों वाले इस गांव की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से सुपारी की खेती पर निर्भर है। पीढिय़ों से चली आ रही इस खेती पर पिछले कुछ वर्षों से ‘पीली बीमारी’ का प्रकोप भारी पड़ रहा है। रोग के कारण उत्पादन घटा है, जबकि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। कुछ किसानों ने वैकल्पिक फसलों का रुख किया, लेकिन वहां भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली। ऐसे में पशुपालन, स्वरोजगार और मजदूरी के सहारे परिवार जीवनयापन कर रहे हैं।
Bनए नियमों से घर और सडक़ को लेकर सवालB
अज्जनगद्दे क्षेत्र में 15 से अधिक घर हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार इन घरों तक पहुंचने के लिए वन क्षेत्र से होकर गुजरना पड़ता है। कुछ परिवारों को वन क्षेत्र से संबंधित नोटिस भी मिलने की बात कही गई है। तोडिक़ाना में कभी दो प्राथमिक विद्यालय बच्चों की चहल-पहल से गुलजार रहते थे। अब पेत्ताजे सरकारी प्राथमिक विद्यालय विद्यार्थियों की कमी के कारण बंद हो चुका है।
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Bयोजना से गांवों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े B
पश्चिमी घाट और जैव विविधता का संरक्षण जरूरी है। लेकिन लोगों को अलग रखकर विकास की योजना बनाई गई तो स्वाभाविक रूप से भय पैदा होगा। किसी भी योजना से गांवों के सतत विकास पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडऩा चाहिए।
— डॉ. एंथनी टी.पी., सेवानिवृत्त प्राचार्य एवं कृषक
Updated on:
11 Aug 2026 06:01 am
Published on:
11 Aug 2026 06:01 am
