गोपीनाथ बोरदोलोई का निधन 5 अगस्त 1950 को हुआ था। वे भारत के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और असम के प्रथम मुख्यमंत्री थे। इन्हें ‘आधुनिक असम का निर्माता’ भी कहा जाता है। इन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया था। 1941 में ‘व्यक्तिगत सत्याग्रह’ में भाग लेने के कारण इन्हें कारावास जाना पड़ा था। वर्ष 1942 ई. में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में भागीदारी के कारण गोपीनाथ बोरदोलाई को पुन: सज़ा हुई। गोपीनाथ ने असम के विकास के लिए अथक प्रयास किए थे। उन्होंने राज्य के औद्योगीकरण पर विशेष बल दिया और गुवाहाटी में कई विश्वविद्यालयों की स्थापना करवाई। असम के लिए उन्होंने जो उपयोगी कार्य किए, उनके कारण वहां की जनता ने उन्हें ‘लोकप्रिय’ की उपाधि दी थी। वस्तुतः असम के लिए उन्होंने जो कुछ भी किया, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। गोपीनाथ बोरदोलोई प्रगतिवादी विचारों वाले व्यक्ति थे तथा असम का आधुनिकीकरण करना चाहते थे। गोपीनाथ बोरदोलाई का जन्म 10 जून, 1890 ई. को असम में नौगाँव ज़िले के ‘रोहा’ नामक स्थान पर हुआ था। गोपीनाथ ने 1907 में मैट्रिक की परीक्षा और 1909 में इण्टरमीडिएट की परीक्षा गुवाहाटी के ‘कॉटन कॉलेज’ से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वे कोलकाता चले गए। कोलकाता में बी.ए. करने के बाद 1914 में उन्होंने एम.ए. परीक्षा उत्तीर्ण की। तीन साल क़ानून की शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे गुवाहाटी लौटे। गुवाहाटी लौटने पर गोपीनाथ ‘सोनाराम हाईस्कूल’ के प्रधानाध्यापक पद पर कार्य करने लगे। 1917 में उन्होंने वकालत शुरू की। महात्मा गांधी ने ‘असहयोग आन्दोलन’ प्रारम्भ किया तो गोपीनाथ बोरदोलोई अपनी चलती हुई वकालत को छोडकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने अपने साथियों के साथ दक्षिण कामरूप और गोआलपाड़ा ज़िले का पैदल दौराकर जनता को विदेशी माल का बहिष्कार करने, अंग्रेज़ों के काम में असहयोग करने और विदेशी वस्त्रों के स्थान पर खद्दर धारण करने का संदेश दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि गोपीनाथ बोरदोलोई और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें एक वर्ष कैद की सजा दी गई। उसके बाद से उन्हने अपने आपको पूरी तरह देश के ‘स्वतन्त्रता संग्राम’ के लिए समर्पित कर दिया। 1932 में वे गुवाहाटी के नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष चुने गए। 1938 ई. में असम में जो पहला लोकप्रिय मंत्रिमंडल बना, उसके मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई ही थे। 1939 में वे असम विधान सभा के सदस्य चुने गए। स्वतंत्रता के बाद गोपीनाथ बोरदोलोई के नेतृत्व में असम प्रदेश में नवनिर्माण की पक्की आधारशिला रखी गई थी, इसलिए उन्हें ‘आधुनिक असम का निर्माता’ भी कहा जाता है। 5 अगस्त, 1950 ई. में जब वे 60 वर्ष के थे, तब उनका देहांत गुवाहाटी में हो गया। उन्हें मरणोपरान्त भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।