
डॉ.फतेह सिंह भाटी 'फतह'
जयपुरजोधपुर हाईवे। रात के कोई बारह बजे होंगे। तारों भरा आसमान, गुलाबी ठण्ड ऐसी की रक्त से मिलकर सीधी कलेजे के भीतर उतर जाती। गाड़ी में बजता गाना हजार राहें मुड़ के देखी...जहां से तुम मोड़ मुड़ गए थे...। अबोली रात की निस्तब्धता, विंड मिरर से झाांकते चांद और शीतल पवन के झाोंकों ने मजबूर कर दिया सारे शीशे खोलने को। वातावरण इतना मनोहारी था कि घर पहुंचने की शीघ्रता को भूल हाईवे पर भी गाड़ी का स्पीडोमीटर बस तीस चालीस के इर्द गिर्द घूमने लगा।
अभी सौ किलोमीटर ही चला था कि इस सबके बावजूद दिन भर की थकान ने अपना असर दिखाना प्रारम्भ कर दिया। काफी प्रयास के बाद भी आंखें बार-बार मुंदने लगीं। समय देखा रात्रि के साढ़े बारह, अभी दो ढाई घंटे सफर बाकि था जोधपुर पहुंचने के लिए। मन ने कहा बेहतर होगा कि कोई अच्छी मिडवे होटल दिखे तो रात वहां गुजारी जाए। कुछ आगे बढ़ा ही था कि एक अच्छी सी होटल दिख गई।
देर रात्रि में ऐसी होटलों में स्वागतकर्ता और मैनेजर से लेकर मालिक तक की अकेले जिम्मेदारी निभाने वाले आदमी ने गाड़ी की आवाज सुनते ही कुर्सी पर बैठे बैठे ही मुंडी कम्बल से बाहर निकाली। उसके सामने पहुंचा तो एक नजर सर से पांव तक देखा। अपने अनुभव से शायद उसने अनुमान लगा लिया था।
साब सरकारी अधिकारी हैं?
हां
साब किस विभाग में?
तुम्हें इससे क्या? मुझो रात भर रुकना है कमरा मिल जाएगा?
मंद मुस्कराते हुए बोला, जी जरूर
अब भी उसके भीतर मुझसे कुछ जानने की छटपटाहट थी, पर मेरे पहले जवाब की वजह से उधेड़बुन में था कि पूछा जाए या नहीं।
साब हमारे पास सिंगल बेडेड, डबल बेडेड रूम्स और डोरमेट्री भी है। मेरी रूम की पसंद से भी ज्यादा उसकी नजरें यह जानने को उत्सुक थी कि मैं कौनसे विभाग में अधिकारी हूं, कारण शायद यही कि पैसे देकर रुकने वाला हूं या मुफ्त की सेवाएं लेने का उत्सुक हूं। मुफ्त के चक्कर में कोई गंदा सा मच्छरों वाला कमरा नहीं पकड़ा दे इसलिए मैंने उसका भ्रम दूर करना उचित समझाा। अरे भाई किसी भी विभाग से होऊं तुम्हारे चार्जेज पूरे दे जाऊंगा और जाते वक्त तुम्हें टिप भी। मुझो उगता सूरज बहुत चित्ताकर्षक लगता है, सुबह बालकोनी में बैठ उसका पूरा आनन्द लेना चाहता था, इसलिए बोला, साफ सुथरा रूम, जिसमें बड़ी सी बालकनी बाहर खुलती हो, आसमान को देखा जा सके, हवा अच्छी आती हो पर प्राइवेसी पूरी हो, बताओ। अब उसका अधिकांश भ्रम दूर हो गया था, सर डबल बेडेड ही ना?
अब की बार मैं थोड़ा जोर से बोला-हां भाई समझा में नहीं आता क्या?
सॉरी सर, कहा और चुपचाप सामान लेकर प्रथम तल पर ले गया, सामान रखा।
सर, खाने में क्या लेंगे?
खाना खाया हुआ है।
ठीक है सर और वो व्हिस्की या बियर?
नहीं-नहीं दारू नहीं चाहिए।
ज्यादा नहीं दो पैग ले लीजिए सर।
नहीं कह दिया ना, समझा नहीं आता क्या?
जी सॉरी सर।
सर और कुछ व्यवस्था?
सारी व्यवस्था है मेरे पास है, अब जाओ
पानी की बोतल और एक कप चाय पहुंचा दो बस।
जी सर, नीचे के दरवाजे के कुण्डी लगी है बस, मैं वहीं पास के कमरे में सो रहा हूं काम हो तो बता देना।
ओह्ह...माथा चाट गया, कितनी तेज नींद आ रही थी उड़ा दी।
बालकोनी में रखे सोफे पर पसर गया, इतने में वह चाय दे गया।
आह! कितनी खूबसूरत निशा, काली चुनर पर झिालमिलाते हुए मोती, ऐसा लगता है हवा के झाोंकों से ये चुनर हिलती है तो मोती झिालमिलाने लगते हैं। चन्द्रमा के इस प्रकाश से हवा भी शीतल हुए जा रही है। देखो इस दूधिया रोशनी में तुम्हारे दांतों की पंक्ति कैसी चमक रही है, जैसे मोतियों की माला पहन रखी हो, इस तरह मुस्कुराते हुए तुम कितनी अच्छी लगती हो? अरे! सर्दी कितनी बढ़ गई, तुम तो ठिठुरते हुए दोहरी होती जा रही हो, दूर क्यों बैठी हो ठण्ड लग जाएगी, इधर आ जाओ मेरी बांहों में, तुम्हें भी सुकून आ जाएगा और मुझो भी ऊष्णता मिलेगी, मिल कर इस खूबसूरत आसमान को निहारते हंै, चन्द्रमा की चांदनी का आस्वादन करते हैं। अरे इतनी किससे शरमा रही हो, मुझो पता है नाइट लैंप जलते हुए भी तुम कभी मेरे पास नहीं बैठती, चांदनी की इस मद्दम रोशनी में चार पांच फीट से आगे दृश्यता नहीं है, रेगिस्तान के इस सूने जंगल में सामने के पेड़ पर कोई उल्लू हो तो अलग बात है वर्ना इस अंधेरी रात्रि में तुम्हारे, मेरे और चांद तारों के सिवाय कोई साक्षी नहीं बनने वाला तुम्हारे सौन्दर्य का फिर भी इतनी लज्जा?
तुम भी कितनी अजीब हो? यूं तो कभी चुप नहीं होती और मेरे बोलते ही तेरे होंठों के ताले लग जाते हंै। इससे तो बेहतर था कि मैं चुप रहता, तुम्हारे इस भोले चेहरे पर बड़ी-बड़ी आंखों और लम्बी नाक के नीचे मासूमियत भरी मुस्कुराहट निहारता रहता। सूर्य के प्रकाश से कवियों का प्रिय शशि इस धरा पर जितना खूबसूरत दिखता है अभी उससे भी मोहक लग रहा है तुम्हारा अप्रतिम सौन्दर्य चन्द्रमा के दूधिया प्रकाश में। दिल चाहता है कभी सवेरा हो ही नहीं, बस यह सुहानी, सुकून भरी रात चलती ही रहे घंटों, दिनों, महीनों और वर्षों तक। जैसे गगन में सप्तऋषि आपस में हाथ पकड़ बैठे हैं तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेकर बैठा रहूं पर तुम मानती कहां हो। दिन हो या रात मेरे से कितनी आंख मिचोली खेलती हो।
सुबह की ही तो बात है अपन दोनों सूर्योदय से पूर्व ही मोर्निंग वाक पर निकल गए थे। सरसों के खेतों के बीच से होते हुए जब लौट रहे थे तब भास्कर ने पूर्व के क्षितिज से झाांकना शुरू कर दिया था, उनकी रश्मियों से खेतों में लगी सरसों के पीले फूलों के मध्य तुम्हारी सुनहरी पीली चुनरी तथा हरे रंग का लहंगा कितने मोहक लग रहे थे। उस समय तेरे चेहरे के सामने सूर्यदेव भी फीके नजर आ रहे थे। तुम्हें बांहों में भर लेने के लिए मैंने हाथ बढाए ही थे कि तभी तुम सरसों के बीच से कहीं गायब हो गई थी। तुम सदैव कहती हो तुम्हें एकान्त चाहिए जहां तुम्हारे और मेरे सिवाय कोई नहीं हो, तभी मेरी बांहों में झाूलोगी, उस वक्त तो मैं भूल गया था सूर्यदेव साक्षी बन रहे थे पर अब इस रात्रि के सन्नाटे को बस झाींगुरों की आवाज तोड़ती है, यहां कौन है जिससे लजा रही हो? इन चांद तारों से या फिर पवन का यह शीतल स्पर्श तुम्हें एकान्त का अनुभव नहीं होने देता, आसपास ही किसी के होने का अहसास करवा रही है? तारों से दृष्टि हटा उधर देखा तो मेरा सितारा तो सोफे पर था ही नहीं। तुम भी कितनी खुदगर्ज हो, नींद आ रही थी तो मेरे को बोल देती मैं यहां किसलिए बैठा हूं? ये चांद तारे, हवा की शीतलता, रात्रि की मादकता सब कुछ तुम्हारे होने से ही तो है, तुम नहीं तब ये कहां, इनकी तो बात छोड़ो तुम्हारे बिना मुझामें मैं भी कहां?
चलो अच्छा ही किया, समय पर सो जाते हैं, सुबह जल्दी उठकर घर भी तो चलना है।
सुबह छह बजे होटल वाले को चाय का कह रखा था, उसके घंटी बजाने पर दरवाजा खोला। चाय रखते हुए उसकी नजरें कुछ ढूंढ रही थी। बेड में मैं ही था, थोड़ा सा इधर उधर होते हुए उसने बालकनी पर नजरें टिकाई, वहां खाली सोफे पड़े थे, बाथरूम का दरवाजा बंद था, उसके चोकन्ने कानों को शायद वहां से किसी आवाज की अपेक्षा थी पर निराशा हाथ लगने से बाहर निकल गया।
मैं उठा, हाथ मुंह धोए, ब्रश किया और चाय पीने बैठा तो देखा मेरे अकेले के लिए चाय के दो कप? इस खूबसूरत सुबह की चाय अब मेरे लिए आनंददायक होने की बजाय रहस्यमयी होती जा रही थी। उस लड़के का इधर उधर ताक झाांक करना, दो कप चाय लेकर आना। मेरे कुछ समझा में नहीं आ रहा था, थोड़ी देर माथा पकड़ बैठा रहा फिर सोचा जाने दो अपना क्या, रात निकालनी थी निकल गई, ऐसे किस-किस का टेंशन लूं, उसकी वही जाने। तैयार होकर नीचे गया चाबी दी तो उसने कहा-सर दो मिनट बैठें अभी हिसाब करता हूं। वह ऊपर गया रूम देख कर बंद किया और नीचे आया। अब मेरे से ज्यादा रहस्य उसके मन में था, इसलिए फूट पड़ा। साब बुरा नहीं माने तो एक बात पूंछूं?
हां पूछो।
सर मुझो यहां नौकरी करते सत्रह-अठारह बरस हो गए। देखिए साब मेरी तो रोजी रोटी का सवाल है मालिक के कहे अनुसार जैसा आदमी आता है उसे उसी तरह से खुश रखना पड़ता है। कुछ थके हारे ट्रक ड्राइवर दो चार घंटे नींद लेने रुकते हैं, वे डोरमेट्री से काम चला लेते हैं बाकी अधिकांश लोग कमरे लेते हैं तो अपनी मनपसन्द दारू और लड़की की डिमांड करते हैं। कुछ ऐसे होते हंै जो दोनों चीजें साथ लाते हंै। ऐसे में मैं गेट के पास वाले कमरे में सोने को कह देता हूं पर ईमानदारी से कहूं मन नहीं मानता इसलिए ईधर उधर से ताक झाांक कर पता करता हूं क्या हो रहा है। इसीलिए आपको भी कह कर गया था कमरे में सोने जा रहा हूं पर बहुत कोशिश के बाद भी आपको न तो बाहर जाते देखा, न उसे भीतर आते और न ही अभी किसी को कमरे से बाहर निकलते।
कहना क्या चाहते हो तुम? न तो मैं बाहर गया और न ही कोई मेरे कमरे में आया तो मेरे सिवाय बाहर कौन निकलेगा?
माफ कीजिएगा साहब, बुरा मत मानिएगा हमारे मालिक का भी आदेश है कि अपने तो उनकी जरूरत के हिसाब से चार्जेज लेने बाकी किसी से कोई पूछताछ नहीं करनी इसलिए मैं कोई पूछताछ नहीं कर रहा, आपसे तो एक्स्ट्रा वाले चार्जेज भी नहीं लूंगा पर रात से लेकर अभी सुबह होने तक मेरा दिमाग फटा जा रहा है कि वो कहां से आई और कहां गई जिससे आप घण्टों तक रात को बातें कर रहे थे।
ओह्ह...क्या सचमुच मैं रात को उससे बातें कर रहा था? जब मन होता है वो आ जाती है और अचानक से चली जाती है, रात को भी ऐसा ही हुआ, बालकोनी से उठकर अन्दर कमरे में कब गई मुझो भी पता नहीं चला, जब मैं पीछे पीछे भीतर गया तो वहां भी नहीं थी, मैंने सोचा नीचे आकर तुम्हें पूछता हूं पर दरवाजे पे नजर गई तो मेरा कमरा भीतर से ही बंद था, चिटकनी लगी थी ऐसे में वह बाहर कैसे जा सकती थी। एक बार फिर उसे कमरे में, बालकोनी में सब जगह ढूंढा पर नहीं मिली। पता नहीं कहां से आई और कहां को गई वो ही जाने। मेरी मां और दोस्त भी कहते हंै मुझो वहम होता है। ऐसा कई बार करता हूं पर वह मेरे सामने होती है बातें करती है, यह वहम कैसे हो सकता है?
साहब बुरा नहीं मानें तो एक बात बोलूं?
बोलो
वह देखिए दरवाजे पर ताला है जिसकी चाबी मेरे पास है, आपका कमरा भी देख लिया मैं मेरी तरफ से आश्वस्त था कि कोई लड़की नहीं थी फिर भी शंका थी इसलिए आपसे पूछ लिया। बुरा मत मानना साब दावे से कह सकता हूं कि आपके कमरे में कोई लड़की नहीं थी, सिर्फ वहम था। मेरे एक रिश्तेदार के साथ भी ऐसा होता था उसे वह सुनाई पड़ता जो किसी ने न कहा हो, वह दिखाई देता था जो हो ही नहीं फिर मनोचिकित्सक को दिखाया तो उन्होंने कहा कोई स्किजोफे्रनिया नाम की बीमारी है, कुछ दवाइयां दी, लेता है अब ठीक है। भगवान करे आपको वैसी बीमारी नहीं हो, वहम ही हो पर एक बार डॉक्टर को दिखाने में क्या हर्ज है?
हा हा हा....कुछ वहम भी जिन्दगी में खुशियों के रंग भरते हों, सुकून देते हों, अपनों से जोड़े रखते हो तो उन्हें जिन्दा रखने में क्या हर्ज हैं? अच्छा चलता हूं।
Published on:
09 Jan 2018 06:19 pm
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