10 अप्रैल 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

संपादकीय: ‘पिंक क्रेडिट’ की तस्वीर सकारात्मक बदलाव वाली

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष २०१७ के १६ लाख करोड़ की तुलना में भारत में महिला कर्जदारों का क्रेडिट पोर्टफोलियो वर्ष २०२५ तक बढ़कर ७६ लाख करोड़ हो गया है।

2 min read
Google source verification

हरीश पाराशर - महिलाओं की भूमिका भारतीय समाज में लंबे समय से घर-परिवार के संचालन तक ही सीमित मानी जाती रही थी। पिछले दशकों में इस भूमिका से आगे आकर महिलाओं ने हर क्षेत्र में परचम फहराते हुए अलग से पहचान बनाई है। अब तो महिलाएं केवल घर-परिवार की धुरी ही नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद भी बन रही है। नीति आयोग की रिपोर्ट के दूसरे संस्करण 'बरोअर्स टू बिल्डर्स: वुमन एंड इंडियाज इवॉल्विंग क्रेडिट मार्केट' में भारत में महिला कर्जदारों के क्रेडिट पोर्टफोलियो की, जो बढ़त दिखाई गई है वह देश में महिलाओं में बढ़ती उद्यमशीलता और जोखिम लेने की क्षमता की ओर संकेत करती है।

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष २०१७ के १६ लाख करोड़ की तुलना में भारत में महिला कर्जदारों का क्रेडिट पोर्टफोलियो वर्ष २०२५ तक बढ़कर ७६ लाख करोड़ हो गया है। बीते तीन साल में ही महिलाओं की पुरुषों के मुकाबले व्यावसायिक ऋण लेने की रफ्तार भी तेजी से बढ़ी है। अब देश के कुल क्रेडिट सिस्टम में महिलाओं की भागीदारी २६ प्रतिशत तक पहुंच गई है। हाउसिंग लोन लेने में भी महिलाएं आगे बढ़ रही हैं, जो उनकी संपत्ति के मालिकाना हक का भी संकेत देने वाला है। महिलाओं में उद्यमशीलता बढ़ती है तो जाहिर तौर से यह देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती की दिशा में भी काम करती है। हालांकि आंकड़ों को अभी अधिक संतोषजनक इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि ऋण लेने योग्य महिलाओं में महज ३६ फीसदी ने ही औपचारिक ऋण तक पहुंच बनाई है। यह तथ्य जरूर उल्लेखनीय है कि ३० वर्ष से कम उम्र की युवतियों का कर्ज के प्रति जो रुझान सामने आया है उनमें १८ फीसदी बिजनेस लोन ले रही हैं। जाहिर है कि यह महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर तो प्रदान कर ही रही हैं, अन्य महिलाओं के लिए रोजगार के दरवाजे भी खोल रही हैं। वित्तीय संस्थाएं भी 'पिंक क्रेडिट' योजनाओं के तहत महिलाओं को कम ब्याज दरों और लचीली शर्तों पर ऋण दे रही हैं। समय पर ऋण चुकाना, बचत की आदत और योजनाबद्ध निवेश ने महिलाओं को वित्तीय संस्थानों के लिए भरोसेमंद ग्राहक बना दिया है। इससे महिलाएं न केवल उपभोक्ता, बल्कि निवेशक और निर्माता के रूप में भी उभर रही हैं। छोटे स्तर के स्टार्टअप से लेकर बड़े उद्योगों तक वे अपनी पहचान बना रही हैं।

निश्चित ही महिला उद्यमशीलता का यह विस्तार भारत को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ा रहा है। महिलाओं की इस वित्तीय भागीदारी का असर केवल अर्थव्यवस्था तक ही सीमित हो ऐसा नहीं है। यह हमारी सामाजिक संरचना को भी बदलने वाला है। आर्थिक स्वतंत्रता से महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा है, निर्णय लेने की क्षमता मजबूत हुई है और परिवारों में संतुलन आया है। निश्चित ही महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होंगी तो हमारी शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।