
Bakreed 2019: चमड़े की गिरती कीमतों का मुद्दा सोशल मीडिया पर छाया, जयपुर के मुफ्ती ने जारी किया फतवा
जयपुर
मुस्लिम समाज ( muslim community ) का बड़ा त्योहार ईद उल अजहा( Eid ul Adha 2019 ) सोमवार को मनाया जाएगा। जिसकी तैयारियां जोरों पर हैं। कुर्बानी के बाद हासिल होने वाला चमड़ा ( लेदर ) इनदिनों social media पर चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल हुआ कुछ यूं कि पिछले कुछ सालों से चमड़े की कीमतों में भारी गिरावट आ गई है। एक बकरे का चमड़ा बीते सालों में 300 - 350 में बिका करता था, वह अब 30 से 40 रूपए में ही बिक रहा है।
मामूली कीमत पर बेच देना लोगों की मजबूरी
इस मामले में खास बात यह है कि चमड़े से बनी वस्तुओं की कीमत में तो लगातार बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन इसकी खरीद की कीमत घट रही है।
। जानकारों का यह कहना है कि बकरीद के दौरान चमड़े को मामूली कीमत पर बेच देना लोगों की मजबूरी है।
गरीबों को ही दिया जा सकता है चमड़े का पैसा
इस्लाम के मुताबिक यदि कोई कुर्बानी करने वाला व्यक्ति चमड़े को बेच देता है तो इससे मिलने वाले रूपए वह खुद इस्तेमाल नहीं कर सकता। बल्कि इन रूपयों को गरीबों को देने का आदेश है।
सोशल मीडिया पर दी जा रही है ये राय
मुस्लिम समाज में आजकल सोशल मीडिया पर एक वीडियो छाई हुई है। जिसमें राय दी जा रही है कि इस साल ( Bakreed 2019 ) चमड़े को बेचा न जाए और दफना दिया जाए या फैंक दिया जाए। ताकि मार्केट में खालो की कमी महसूस हो और कीमत में इज़ाफा हो जाए, और चमड़े के कारोबारी इसकी कीमतों में इजाफा करें।
जयपुर के मुफ्ती ने दी ये राय (Fatwa on qurbani leather )
इस मामले में समाज ने जब जयपुर के मुफ्ती मोहम्मद ज़ाकिर नोमानी ( jaipur mufti mohammad zakir ) से राय जानी तो उन्होंने मामले पर फतवा जारी किया, जिसमें कहा गया है कि इस हालात में जो भी कीमत मिल रही है उसे हासिल करके गरीब को दी जा सकती है। या फिर चमड़ा बेचने के बजाए उसे साफ करने के बाद इस्तेमाल करने, जरूरतमंद को दे देेने सलाह दी है। ऐसा करने वालों पर चमड़े के रूपए गरीबों को देने वाला नियम लागू नहीं होता।
ये बात कही है शहर मुफ्ती ने फतवे में... ( use of qurbani leather )
यह हकीकत वाकिया है कि हमेशा खालों की कीमत में इज़ाफा हुआ करता था, जिससे दीनी मदारिस में मकातिब फुकराह व मसाकीन व मुस्तहिक्कीन को फायदा था, लेकिन अब चंद सालों से लगातार कीमतों में गिरावट आ रही है। हालात यह हैं कि ₹50 कमो-बेश बकरे की खाल फरोख्त होने लगी, जबकि यह भी हकीकत व है कि चमड़े के मस़नुआत की कीमतों में खातिर ख्वाह कमी नहीं आ रही है, अगर बात यह बात भी कही जा रही है कि आलमी तौर पर खालो की कीमत में गिरावट आ रही है। अगर ऐसा है तो इसी गिरावट के तनासुब से चर्म कुर्बानी की कीमतों में भी गिरावट आनी चाहिए। लेकिन ऐसा ना हो कर कहीं 10% कहीं 20% तक हासिल हो पा रही है इस सूरते हाल में बेहतर है कि...
(1) कुर्बानी की खालों को अपने ज़ाति इस्तेमाल में लाने की कोशिश भी की जाए जब शरअन कुर्बानी करने वाला चर्म कुर्बानी को खुद के इस्तेमाल व मसरफ में ला सकता है तो क्यों काम मे ना लायें, फुक़हा ने तसरीह की है कि मसलन ढोल दस्ताने खुफ्फेन बिछात वगैरह बना कर काम में लाया जा सकता है। इसी तरह टोपी जरकिन जाकिट जानमाज़ वगैरह भी बना या बनवाया जा सकता है, अलबत्ता माहौल उमूमी ना होने और इसके तरीके कार सफाई सुथराई और खराबी व सड़ांध से बचाने की तदबीर मालूम ना होने की वजह से दुश्वारी व मुश्किलात का सामना पड़ सकता है, खानगी व घर के इन कामों को भी सीखना वक्त का तकाज़ा है।
(2) किसी दूसरे शख्स को जो इसे इस्तेमाल में ला सके दे दिया जाए, हिबा कर दिया जाए।
(3) किसी ऐसी चीज के बदले दे दिया जाए जिसको बाकी रखकर फायदा उठाया जा सके लेकिन जाहिर है कि जब खुद खाल की कीमत ही थोड़ी सी होगी तो इसके बदले में कोई चीज भी ली जाए वह भी कम ही होगी।
(4) चर्म कुर्बानी फरोख्त करके ख्वाह जिस कीमत पर हों इसकी कीमत सद्क़ा कर दी जाए।
हकीम मुफ्ती अहमद हसन खां साहब रहमतुल्लाह अलह फरमाते हैं :- चर्म कुर्बानी खुद के कामों में इस्तेमाल की जा सकती है, मसलन ढोल खुफ्फेन दस्ताने मुसल्ले बिछोना बगैरा इसी तरह चर्म कुर्बानी अमीर व फक़ीर किसी को भी दी जा सकती है लेकिन अगर रकम के बदले फरोख्त कर दी गई तो इसकी रकम का सद्का करना लाज़िम है और इसके मसारिफ वही है जो ज़कात व फितरे के हैं। ( फतावा इल्मों हिकमत जिल्द 2 सफा 563 )
मुफ्ती मोहम्मद ज़ाकिर
( मुफ्ती शहर जयपुर )
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Updated on:
11 Aug 2019 02:06 am
Published on:
10 Aug 2019 08:54 pm

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