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विरासत के झरोखे से : कभी खनकती थी पनिहारिनों की पायल, अब…

मैं नीमराणा की प्राचीन बावड़ी हूं। कहने को तो मुझे एेतिहासिकता का तमगा मिला हुआ है, लेकिन आज भी मुझे लोगों व सरकारी एजेंसियों के अपेक्षित व्यवहार का इंतजार है। कुछ सालों पहले की तो बात है, जब मेरे यहां पनिहारिनों का मेला लगा रहता था।

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मैं नीमराणा की प्राचीन बावड़ी हूं। कहने को तो मुझे एेतिहासिकता का तमगा मिला हुआ है, लेकिन आज भी मुझे लोगों व सरकारी एजेंसियों के अपेक्षित व्यवहार का इंतजार है। कुछ सालों पहले की तो बात है, जब मेरे यहां पनिहारिनों का मेला लगा रहता था।

पानी भरने के लिए जब पनिहारिनें यहां पहुंचती थी तो एकबारगी वातावरण में पायल की खनक गूंज उठती थी, लेकिन अब...। मैं ही तो थी, जो गांव वालों के हलक तर करा करती थी, लेकिन अब मुझे ही प्यासा बना दिया गया है। जिम्मेदार मेरे पास से गुजर जाते हैं, लेकिन सारसंभाल की ओर ध्यान नहीं देते।

एेसा भी नहीं कि मेरे उद्धार का किसी ने बीड़ा नहीं उठाया। कुछ साल पहले लाखों रुपए की लागत से मेरी सूरत संवारने की कोशिश भी की गई, लेकिन बुझे मन से। तभी तो मेरी दीवारों पर लगाया गया शिलापट्ट भी उखड़ गया, लेकिन किसी ने फिर से इसे लगाने की जहमत नहीं उठाई।

हालांकि, गाहे-बगाहे यहां देसी-विदेशी सैलानी पहुंचते हैं और मुझे अपने कैमरे में कैद करते हैं तो कुछ सुकून मिलता है कि चलो मेरी अहमियत का लोगों को पता तो है। दर्द यही कि यहां आने वाले सैलानियों को मेरा ये चेहरा तो नजर आता है, लेकिन मेरे स्वर्णिम इतिहास से वे अनजान ही रहते हैं।

मैं सिलारपुर रोड पर स्थित हूं। लोग कहते हैं मैं पुरा वैभव की अनूठी इमारत हूं, लेकिन पर्यटन और पुरातत्व विभाग के अधिकारियों की कथित अनदेखी एवं रखरखाव व संरक्षण के अभाव मैं अपनी आभा खोती जा रही हूं। पांच साल पहले घटिया निर्माण के कारण टूटकर गिरी एेतिहासिक स्मारिका पट्टिका की भी अब तक सुध नहीं गई है।

मेरा निर्माण तत्कालीन नीमराणा रियासत के राजा मानसिंह द्वारा संवत 1740 में कराया था। मैं नौ मंजिला हूं और मुझे में150 सीढि़़यां हैं। मेरी गहराई 250 फीट है। मुझ से सटा एक कुआं है , लेकिन वह सूख चुका है। मेरी प्रत्येक मंजिल से दूसरी मंजिल तक आया जा सकता है।
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नहीं होता अमल

चार साल पहले पर्यटन विभाग के तत्कालीन शासन सचिव आर.एच.वाजा, तत्कालीन अलवर जिला कलक्टर आशुतोष एटी पेडणेकर, पर्यटन विभाग के निदेशक देव बर्मन, उपनिदेशक आरएस गंगवाल, बावड़ी जीर्णोद्धार कार्यकारी एजेंसी, जिला परिषद एवं अन्य अधिकारियों की नीमराणा फोर्ट में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बैठक हुई थी। उसमें निर्णय तो खूब हुए, लेकिन वे धरातल पर नहीं उतर पाए।

खर्च हुए 25 लाख

वर्ष 2005 में पर्यटन विभाग की ओर से पर्यटन विलेज योजना में मेेरा चयन कर प्रारंभिक तौर पर 25 लाख रुपए खर्च किए गए थे, लेकिन यह राशि भी मेरे सौन्दर्य को लग रहे ग्रहण को नहीं मिटा पाई। सात साल पहले खर्च हुए 62 लाख रुपए का असर भी नजर नहीं आता।

झरोखे भी चुराए

मेरे आंचल में जगह जगह लगे बेशकीमती पत्थरों के कलात्मक झरोखे भी लोगों ने नहीं छोड़े। अपनी स्थापत्य कला से लोगों का मन मोहने वाली मेरी जालियां भी लोग उखाड़ कर ले गए।

इनका कहना है

कैलाश बोरोडिय़ा विकास अधिकारी नीमराणा पंचायत समिति ने बताया कि बावड़ी का जीर्णोद्धार कार्य मेरी ज्वाइनिंग से पहले हुआ था। इस बारे में ज्यादा मालूम नहीं है। फिर भी इसके बारे में जानकारी जुटाई जाएगी और इसका स्वरूप संवारा जाएगा।

करेंगे प्रयास

लोकेश मीणा उपखंड अधिकारी नीमराणा ने बताया कि टूटी पड़ी स्मारक पट्टिका की जांच कर इसे पुन: लगाए जाने के प्रयास किए जाएंगे। इसके लिए पर्यटन विभाग अलवर से भी बात की जाएगी। एेतिहासिक विरासत की सुरक्षा के लिए भी प्रयास किए जाएंगे।

पंचायत करेगी प्रयास

सतीश मुद्गल सरपंच नीमराणा ने बताया कि एेतिहासिक विरासत नीमराणा की बावड़ी के संरक्षण के लिए पर्यटन व पुरातत्व विभाग के अधिकारियों से सहयोग लिया जाएगा। साथ ही पंचायत भी अपने स्तर पर इसके स्वरूप को बनाए रखने का प्रयास करेगी।