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Govt Jobs: राजस्थान के 1.10 लाख से अधिक संविदा कार्मिकों को कब मिलेगी पक्की नौकरी?

वादे हर सरकार की ओर से किए जाते हैं, लेकिन राजस्थान के संविदा कार्मिकों की पक्की नौकरी की खुशियां कायदों में उलझी हुई है।

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चूरू/सीकर। राजस्थान में संविदा कर्मचारियों को नियमित करने के दावे भले ही हर सरकार की ओर से किए जाते हो। लेकिन संविदा कर्मचारियों को पिछले 15 साल में पूरी राहत नहीं मिल सकी है। पिछली सरकार की ओर से चुनावी साल में संविदा कर्मचारियों को नियमित करने के लिए नया कानून भी बनाया गया। इसके बाद भी प्रदेश के 1.10 लाख से अधिक संविदा कार्मिकों की पक्की नौकरी की खुशियां कायदों में उलझी हुई है।

संविदा कर्मचारियों का कहना है कि बढ़ती महंगाई के बीच वेतन सहित अन्य सुविधाएं नहीं होने से हर चलाना भी मुश्किल हो रहा है। दरअसल, पिछली सरकार ने पहले तो संविदा कर्मचारियों को सीधे ही स्थायी करने का वादा किया था। इसके बाद सेवा नियमों में पूरी तरह मामले को उलझा दिया। अब संविदा कर्मचारियों को नई सरकार से राहत की आस जरूर है।

हर विभाग में संविदा कर्मचारियों की फौज

सरकारी की ओर से संविदा कर्मचारियों की संख्या 1.10 लाख बताई गई है। जबकि कर्मचारी संगठनों के हिसाब से संविदा व मानदेय कर्मचारियों की संख्या चार लाख से अधिक है। कर्मचारी संगठनों के हिसाब से जनता जल योजना के 6500, एनआरएचएम मैनेजमेंट के 2800, फार्मासिस्ट संविदा कर्मचारी 3000, एनयूएचएम के 2200, एमएनडीवाई के 4400, आंगनबाड़ी में करीब 1.50 लाख, मदरसा व पैराटीचर वंचित 4500, लोक जुंबिश के 2200, विद्यार्थी मित्र पंचायत सहायक 27,000, नरेगा कर्मी 19000, प्रेरक 12000, समाज कल्याण विभाग के रसोइए एवं चौकीदार 910, होमगार्ड के 28,000, आईटीआई संविदा कर्मी 2500, कृषि मित्र के 17000, एनआरएलएम कर्मी 1800, व्यावसायिक शिक्षक 1000, शिक्षाकर्मी लगभग 4500, कंप्यूटर शिक्षक 5000, कुक कम हैल्पर 1 लाख, शहरों में विभिन्न अस्पतालों में लगभग 20 हजार संविदा कर्मी लगे हैं।

किस सरकार में क्या दावे हुए

कांग्रेस: 2019 में किया कमेठी का गठन, 2021 में नियम बनाने की घोषणा

कांग्रेस ने सत्ता में आने के बाद एक जनवरी 2019 को संविदा कर्मचारियों की समस्या के समाधान के लिए मंत्री मंडलीय उपसमिति का गठन किया गया था। इसमें तत्कालीन ऊर्जा मंत्री बीडी कल्ला को अध्यक्ष बनाया गया था। तत्कालीन चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा, तत्कालीन शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा, महिला बाल विकास मंत्री ममता भूपेश और खेल मंत्री अशोक चांदना को सदस्य बनाया गया था। कमेटी में कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव को सदस्य सचिव बनाया गया था। कमेटी ने पिछले साल रिपोर्ट दी थी।

भाजपा: पांच साल उलझा रहा मामला फाइलों में

भाजपा सरकार ने 2 जनवरी 2014 को संविदाकर्मियों की समस्याओं के निराकरण के लिए चार सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया था। इसमें तत्कालीन मंत्री राजेंद्र राठौड़ को अध्यक्ष बनाया गया था। तत्कालीन मंत्री यूनुस खान, अजय सिंह को सदस्य बनाया गया था। कमेटी में सदस्य सचिव कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव को बनाया गया था।

अलग से भर्तियों का दावा भी फेल

पिछले साल सरकार ने संविदाकर्मियों को नियमित करने के लिए अलग से भर्ती कराने का दावा किया था। लेकिन एक साल में किसी भी विभाग में अलग से कोई भर्ती नहीं की गई। पिछले साल दावा किया गया कि जो नई भर्ती होगी उनमें भी संविदाकर्मियों के लिए अलग से पद तय किए जाएंगे। पिछले एक साल में 10 भर्तियों के लिए आवेदन मांगे गए। लेकिन एक में भी इस नियम की पालना नहीं हुई। चिकित्सा विभाग में बोनस अंकों के जरिए एक भर्ती की विज्ञप्ति जारी हुई, लेकिन अभी तक परिणाम अटका हुआ है।

स्थायी नौकरी: नए नियमों में उलझे

सरकार ने प्रदेश के 1.10 लाख संविदा कर्मचारियों को स्थायी करने की दिशा में भले ही एक कदम आगे बढ़ाया हो। लेकिन अभी स्थायी की राह पूरी तरह नहीं खुली है। संविदा कर्मचारियों का कहना है कि सरकार को एक आदेश के जरिए स्थायीकरण के आदेश जारी करने चाहिए थे। लेकिन सरकार ने फिर से नए नियमों में उलझा दिया है।

वेतनमान: मानदेय स्लैब नाकाफी

महंगाई के दौर में सरकार ने संविदा कर्मचारियों के मानदेय के स्लैब में ज्यादा बड़ा बदलाव नहीं किया है। इस वजह से प्रदेश के संविदा कर्मचारी खुश नहीं है। संविदा कर्मचारियों का कहना है कि उन्ही पदों पर काम करने वाले स्थायी कर्मचारियों के मुकाबले मानदेय काफी कम है।

फायदा: अब हर साल जारी करने पड़ेंगे आदेश

पंचायत सहायक सहित को हर साल मानदेय सेवा से पृथक कर दिया जाता। संबंधित विभाग को हर साल वित्त में विभाग में प्रस्ताव भेजना पड़ता। इसके बाद विभाग की ओर से इनके आदेश जारी किए जाते है।

चुनौती: दोनों आदेशों में अलग-अलग दावे

सरकार की ओर से इस साल जारी आदेश में स्थायी करने के दावे किए गए। जबकि पिछले साल जारी आदेश में पहले पांच साल और फिर तीन-साल का कार्यकाल बढ़ाने का दावा किया गया था। ऐसे में सरकार के दोनों आदेशों से संविदा कर्मचारियों को नियमित करने की राह में कई चुनौती है।

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