
Health workers got vaccinated in Nagaur
विकास जैन
जयपुर. अपनी जान जोखिम में डालकर कोविड काल ही नहीं बल्कि हर दौर में मरीजों की सेवा में जुटे रहने वाले पैरामेडिकल, फिजियोथैरेपिस्टों और नर्सेज को सरकार की अनदेखी ही लूट व शोषण का शिकार बना रही है। राजस्थान पत्रिका में शुक्रवार के अंक में ..जोखिम में रहती जान, फिर भी स्वास्थ्य पेशेवरों को नहीं गुजारे जितना भुगतान..शीर्षक से समाचार प्रकाशित होने के बाद प्रदेश भर के स्वास्थ्य कार्मिकों ने इस शोषण का जिम्मेदार सरकार की अनदेखी और नीतियों को बताया। इन्होंने कहा कि सरकार भले ही कार्मिकों को वॉरियर का दर्जा देती हो, लेकिन परिवार चलाने जितना भी भुगतान नहीं देना शर्मनाक है।
राजस्थान में फिजियोथैरेपी करने वाले छ़ात्र—छात्राओं की स्थिति तो बेहद बुरी है। इनके लिए राज्य में बार—बार मांग करने के बावजूद किसी भी तरह की काउंसिल नहीं है। ये बिना पंजीकरण ही बेहद कम वेतन पर जॉब शुरू करने को मजबूर हो रहे हैं, वहीं गैर डिग्रीधारी पनप रहे हैं। सरकार के पास इनका कोई रेकार्ड भी उपलब्ध नहीं है। सरकारी स्तर पर इनकी भर्तियों की भी उचित व्यवस्था नहीं है। यहां फिजियोथैरेपिस्ट को सरकारी स्तर भी इंटर्नशिप के दौरान तो इनसे मानदेय तो दिया नहीं जा रहा, बल्कि 25 हजार रुपए लिए जाते हैं। यह पैसा अस्पताल की मेडिकल रीलिफ सोसायटी के लिए कमाई का जरिया बना हुआ है। हरियाणा, मध्यप्रदश, दिल्ली, उत्तरप्रदेश सहित अन्य कुछ राज्यों में काउंसिल है।
स्वास्थ्य कार्मिकों ने पत्रिका को भेजे ये संदेश
. लैब टेक्निशियन पैरामेडिकल कार्मिकों के लिए प्रशिक्षण अवधि के अंदर मानदेय तो दूर दिन-रात सेवाएं देने के बाद भी हॉस्टल तक की व्यवस्था नहीं है।
. ठेका प्रथा पर ही सवालिया निशान है। संविदा के अल्प वेतनभोगी पूरी तरह से निराश होकर टूट जाते हैं। संविदा—निविदा के अंतर्गत कोई भी अभिभावक अपने बच्चों को नौकरी नहीं कराना चाहता, क्योंकि ठेका प्रथा में 7—8 हजार रुपये से शोषण की सभी सीमाएं पार हो जाती है।
. बुजुर्ग मां-बाप की सेवा से लेकर के बच्चों की शिक्षा व परिवार के भरण पोषण की कल्पना मात्र से मन विचलित हो जाता है। आर्थिक, मानसिक और शारीरिक रूप से उम्र भर वो कुंठित और प्रताड़ित रहता है।
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स्वास्थ्य पेशेवर हमेशा मरीजों की सेवा से जुड़े होते हैं। इनका वेतन व मानदेय सम्मानजनक और परिवार चलाने लायक तो होना ही चाहिए। एसोसिएशन के जरिये सरकार तक यह जानकारी पहुंचाएंगे।
डॉ.जोगेन्द्र शर्मा, प्रेसिडेंट, ट्रेंड नर्सेज आफ इंडिया, राजस्थान
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कुछ राज्यों में फिजियोथेरेपी काउंसिल है। इनमें कहीं मानदेय देते हैं, जबकि कुछ में ना दिया जाता है और ना ही लिया जाता है। हमने यह मुदृदा भी उठाया था, लेकिन सरकार ने हमारी नहीं सुनी। फिजियोथैरेपी काउंसिल नहीं होने से पंजीकरण ही नहीं हो रहा और फर्जी डिग्रीधारी पनप रहे हैं।
डॉ.संजय कुमावत, प्रदेश अध्यक्ष, राजस्थान चार्टेड एसोसिएशन आफ फिजियोथैरेपी
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हेल्थ कार्मिक अपने प्रशिक्षण से लेकर सेवानिवृत्ति तक एक अज्ञात अदृश्य संक्रामक दुश्मन से चौबीसों घंटे सीधे लड़ता है। जिसके लिए उन्हें हेल्थ वॉरियर्स की संज्ञा दी जाती है, लेकिन बड़ी ग्लानि होती है कि इनकी मांगों के लिए भी हैं आंदोलनों के दौर से गुजरना पड़ता है।
जितेंद्र सिंह, प्रदेश अध्यक्ष, अखिल राजस्थान लैब टेक्नीशियन कर्मचारी संघ
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एक तरफ मंत्री जी बात कर रहे हैं चिकित्सा में सारे लोग योग्य लगाओ ताकि इलाज ठीक हो सके। दूसरी तरफ उनको इतना कम वेतन मिल रहा है की इनकी मजदूरों से भी बुरी स्थिति है। सीधे शब्दों में सरकार इन पर जुल्म कर रही है। सरकार कम से कम इतना वेतन तो दे कि वो अपना ओर अपने परिवार का पेट भर सकें।
सर्वेश्वर शर्मा ,प्रदेश अध्यक्ष, इंडियन फार्मासिस्ट एसोसिएशन, राजस्थान
Published on:
09 Apr 2022 10:08 am
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