
इधर उधर की...भाभीजी घर पर आपका कर रही हैं इंतजार
चुनाव प्रचार में नेताजी मैदान में उतरे हैं। प्रचार के बहाने वे मतदाताओं की सेवा में इस कदर जुटे हैं कि उनकी कई"छुपी प्रतिभाएं" अब निकल-निकलकर बाहर आ रही हैं। नेताजी की पाक कला हो या फिर बर्तन धोने की कला। हालत तो यह है कि जो कलाएं नहीं आती हैं,वे भी कलाएं भी मतदाताओं को रिझाने के लिए दिखाई जा रही हैं। कचौरी तलवानी हो तो नेताजी तैयार, हलवा बनवाना हो तो नेताजी हाजिर। नेताजी भी कम नहीं हैं। वे भी घर से ही दंड पेलकर निकलते हैं , पता नहीं आज मतदाता उनसे कौनसी कलाबाजी करने को कह दें। मतदाता इन दिनों मदारी बना हुआ है और नेताजी जमूरे। लेकिन इन सब कलाबाजी से मतदाता खुश है तो नेताजी की श्रीमतीजी नाराज हैं। वे कह रही हैं कि जो घर पर चाय का कप उठाकर रसोई में नहीं रखते थे, वे अब घर से बाहर बर्तन धो रहे हैं। खैर...यही लोकतंत्र का आनंद है। नेताजी भी जानते हैं दो-चार दिन तो कुछ भी करवा लो। फिर तो बताएंगे कि मदारी कौन हैं और जमूरा कौन है?
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घर का मामला है भाई
इन दिनों कुछ नेताजी के रिश्तेदार बड़े परेशान हैं। कोई भाई-भाई मैदान में हैं कोई देवरानी-जेठानी। कहीं जीजा-साली,चाचा-भतीजा ही मैदान में उतर आए हैं। नेताजी तो चुनाव लड़ रहे हैं,लेकिन रिश्तेदार के सामने स्थिति ऊहापोह जैसी हो गई है। किसके साथ प्रचार करें। जिसके साथ प्रचार करें दूसरा रिश्तेदार बेमतलब ही "फूफाजी" बन जाते हैं। लेकिन राजनीति में सब चलता है। आखिर कोई भी जीते,जीतने के बाद मिठाई तो सब रिश्तेदार मिलकर ही खाएंगे। आखिर घर का ही तो मामला है।
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भाषण देना भी सीख रहे
यूं तो भाषण देना भी एक कला है। नेताजी इस कला में माहिर होते हैं। लेकिन जो नए-नए नेताजी बने हैं,उनके सामने मुसीबत आ गई है। वे भाषण कैसे दें,किस प्रकार दें। क्या बोलेे,क्या नहीं बोले। किस तरह से खड़े हो। क्या पहने,क्या नहीं पहने। मतदाता से चुनाव प्रचार के दौरान क्या बात करें? इस सबका अब कोर्स नए-नवेले नेताजी रोज कर रहे हैं।
इसके लिए बाकायदा इवेंट कंपनियों की ओर से नेताजी को ज्ञान दिया जाता है, प्रेक्टिस भी कराई जाती है। कुल मिलाकर क्षेत्र के हिसाब से भाषा, हर सभा के बाद स्क्रिप्ट में परिवर्तन और नेताजी की बोली बदलकर आमजन को लुभाने की कवायद की जा रही है।
कुछ भी कहो, बात में तो दम है
राजधानी की कांग्रेस पार्टी की एक महिला नेत्री की हुंकार मारवाड़ तक जा पहुंची। मारवाड़ में दो नेताओं में पिछले लम्बे समय से अदावत चल रही है। ये हैं शेखावत व गहलोत। कल गहलोत के नामांकन पर शेखावत ने आपत्ति की। इस पर राजधानी की महिला नेत्री ने कहा, इतनी ही आपत्ति थी तो उनके सामने मैदान में उतरते। मैदान छोडक़र क्यों भागे? कुछ भी कहो, महिलानेत्री की हुंकार में दम तो है। भाजपा ने कई सांसद मैदान में उतारे। मारवाड़ में भी सांसद उतारने का प्रयोग किया जाना था। सरदारपुरा से नाम तक चल गया। लेकिन अंतिम समय तक सांसद जी का लिस्ट में नाम नहीं आया। अंदरखाने चर्चा अब यही है कि टिकट मिला नहीं,या जानबूझकर टिकट लिया ही नहीं। खैर... यह तो राजनीति की ए,बी,सी,डी जानने वाला ही बता देगा कि टिकट नहीं लेने का माजरा क्या था।
सबकी नजर तीन बजे की सूई पर
कौन मैदान में...कौन रणछोड़दास बनेगा। यह अब तीन बजे की सूई पर अटकी है। आखिर आज नाम वापसी का दिन है। बागियों को बिठाने के लिए कई समीकरण बनाए जा रहे हैं। कद्दावर बागी के लिए उनके आकाओं को तलाशा गया। कुछ बागियों के "कोहनी के गुड़" लगाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि अपनी पार्टी आई तो आपको अच्छा पद देंगे। खैर....किसकी सरकार बनेगी,क्या पद मिलेगा, यह तो बाद में देखेंगे,फिलहाल तो हमारी भी नजर तीन बजे की सूई पर टिकी है।
मर्जी हो कुछ भी बोल लीजिए
ये भई चुनाव हैं। मर्जी हो आप कुछ भी बोल लीजिए। मेवात इलाके एक नेत्री ने पिछले दिनों बोला कि "हमें गोली चलाना भी आता है"। इधर अब ब्रज इलाके से भी एक नेताजी का चुनावी सभा का एक वीडियो वायरल हो रहा है,जिसमें खुलेआम कह रहे हैं कि "मैंने एसपी को भी पीटा है, फलां तो पीटा और बोलते-बोलते यह तक कह गए कि मैंने मुख्यमंत्री काे भी पीटा"। चुनाव हैं भाई,मतदाता को लुभाने के लिए चाहे बर्तन मांजो, चाहे ऊंट-पटांग बोलो। मतदाता सब देख रहा है।
-शहरवासी-
Published on:
09 Nov 2023 11:36 am
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