
Rajasthan Local Body Elections 2026: AI Image
राजस्थान की राजधानी जयपुर में स्थानीय निकाय और पंचायती राज चुनावों से पहले राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। राज्य सरकार द्वारा लॉटरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह साफ हो गया है कि जयपुर नगर निगम में महापौरऔर जिला परिषद में जिला प्रमुख दोनों के पद 'अनारक्षित' श्रेणी में रखे गए हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि अब सामान्य, अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग का कोई भी निर्वाचित पार्षद या सदस्य महापौर व जिला प्रमुख की कुर्सी पर काबिज हो सकता है।
गौरतलब है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार द्वारा वर्ष 2020 में जयपुर को 'ग्रेटर' और 'हेरिटेज' नाम के दो नगर निगमों में बांटा गया था और दोनों जगह महापौर का पद ओबीसी महिला के लिए आरक्षित था। लेकिन वर्तमान भजनलाल शर्मा सरकार द्वारा 'एक शहर-एक मेयर' व्यवस्था को पुन: लागू करने और जयपुर को फिर से 150 वार्डों के साथ एक निगम बनाने के फैसले के बाद अनारक्षित लॉटरी ने दावेदारों का राजनीतिक गणित पूरी तरह बदल दिया है।
1994 में जयपुर नगर निगम के गठन के बाद से महापौर पद का आरक्षण अलग-अलग वर्गों से गुजरता रहा है। इस बार सीट के पूरी तरह अनारक्षित होने से पुरुष नेताओं और सामान्य वर्ग का बड़ा संकट टल गया है, जिन्हें पिछली बार अवसरों से वंचित रहना पड़ा था।
दावेदारों की संख्या में 5 गुना इजाफा: आरक्षित सीटों पर केवल संबंधित वर्ग के प्रत्याशी ही दावेदारी कर पाते हैं, लेकिन अनारक्षित सीट होने के कारण भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों में हर वर्ग के स्थानीय नेता और पूर्व पार्षद टिकट की कतार में खड़े हो गए हैं।
एकल निगम का राजनीतिक फायदा: जयपुर के पुराने परकोटे के मुस्लिम बहुल इलाकों में जहां कांग्रेस की परंपरागत पकड़ मजबूत मानी जाती है, वहीं बाहरी और नए विकसित इलाकों (जैसे मानसरोवर, वैशाली नगर, विद्याधर नगर) में भाजपा को बढ़त मिलती रही है। अब एक ही निगम होने से दोनों दलों के बड़े दिग्गजों की साख दांव पर होगी।
पार्षदों की निष्ठा और गुटबाजी: 150 वार्डों के पार्षदों में से बहुमत पाने वाले दल का ही पार्षद मेयर चुना जाएगा। ऐसे में जीत दर्ज करने के बाद अपने पार्षदों को एकजुट रखना पार्टियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होगा।
केवल नगर निगम ही नहीं, बल्कि जयपुर जिला परिषद का जिला प्रमुख पद भी इस बार अनारक्षित रखा गया है। पिछली बार यह पद सामान्य महिला के लिए आरक्षित था।
57 वार्डों का विशाल मैदान: जिला परिषद के कुल 57 वार्डों के कारण अब ग्रामीण जयपुर (चौमूं, सांगानेर, बस्सी, जमवारामगढ़, कोटपूतली आदि क्षेत्रों) की राजनीति में गर्माहट आ गई है।
जातीय समीकरणों का दबाव: अनारक्षित सीट होने से किसी खास सामाजिक वर्ग की बाध्यता समाप्त हो गई है। लिहाजा, भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए राजपूत, जाट, गुर्जर, मीना और ब्राह्मण बाहुल्य क्षेत्रों में टिकट बांटते समय क्षेत्रीय और जातीय संतुलन साधना सबसे कड़ा इम्तिहान होगा।
मेयर व जिला प्रमुख पद अनारक्षित हो चुके हैं, लेकिन राजनीतिक दलों का मानना है कि असली बिसात 17 अगस्त को निकलने वाली वार्ड वार आरक्षण लॉटरी के बाद बिछेगी। 17 अगस्त को 150 वार्डों में महिला, एससी, एसटी और ओबीसी सीटों का निर्धारण होगा। कई दिग्गज नेताओं का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि उनका गृह वार्ड अनारक्षित रहता है या आरक्षित श्रेणी में चला जाता है। इसके अगले दिन यानी 18 अगस्त को पंचायत समितियों और ग्राम पंचायतों के स्तर पर सरपंचों व वार्ड पंचों की लॉटरी निकाली जाएगी।
Updated on:
14 Aug 2026 08:56 am
Published on:
14 Aug 2026 08:56 am
