
फोटो: पत्रिका
Jaipur Literature Festival 2026: लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन चारबाग में आयोजित सेशन द लाइटनिंग किड में शतरंज के दिग्गज खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद ने राहुल भट्टाचार्य के साथ संवाद करते हुए अपने करियर, प्रतिस्पर्धा की मानसिकता और सीखने की प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा की।
विश्वनाथन आनंद ने कहा कि अपने करियर के इस चरण में वह अब पहले की तरह पूरे वर्ष लगातार टूर्नामेंटों के सर्किट में भाग नहीं लेते। कुछ वर्ष पहले उन्होंने यह निर्णय लिया कि न तो भावनात्मक रूप से और न ही प्रतिस्पर्धात्मक रूप से वह इस निरंतर दबाव के लिए स्वयं को तैयार पाते हैं। अब वह केवल उन्हीं टूर्नामेंटों में हिस्सा लेना पसंद करते हैं जो उन्हें वास्तव में आकर्षित करते हैं।
उन्होंने बताया कि इस चयन की आजादी के साथ एक चुनौती भी जुडी होती है। हर बार प्रतिस्पर्धा में लौटने से पहले उन्हें स्वयं को फिर से एक प्रतिस्पर्धी मानसिक अवस्था में लाने के लिए एक से दो महीने का समय देना पड़ता है।
आनंद के अनुसार, प्रतिस्पर्धा की भावना कोई स्थायी स्थिति नहीं होती, उसमें समय-समय पर भीतर जाना और बाहर आना पड़ता है। लंबे अंतराल के बाद शतरंज की बिसात पर तेज और सटीक निर्णय लेने की क्षमता को फिर से विकसित करना आवश्यक हो जाता है।
जब उनसे पूछा गया कि वह इतने लंबे करियर में दबाव को कैसे संभालते हैं, तो आनंद ने कहा कि सबसे जरूरी है यह सीखना कि दबाव को कब और कैसे टालना है। उन्होंने कहा कि हर स्थिति में खुद पर अनावश्यक दबाव डालना सही नहीं होता। इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि व्यक्ति को खुद को स्वीकार करना और अपनी सीमाओं को पहचानना बेहद आवश्यक है। आत्म स्वीकृति ही मानसिक संतुलन बनाए रखने की कुंजी है।
अपने बचपन को याद करते हुए आनंद ने कहा कि कम उम्र में सीखने की क्षमता बेहद सहज होती है। नए खेल हों या भाषाएं, बचपन में सब कुछ सरल लगता है। उन्होंने बताया कि छह-सात वर्ष की उम्र में ही वह नियमित रूप से शतरंज खेलने जाया करते थे हर सोमवार और गुरुवार की शाम तथा रविवार को सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक।
उस दौर में वह मुख्य रूप से ब्लिट्ज शतरंज खेलते थे, जिसे पहले लाइटनिंग गेम्स कहा जाता था। यही अनुभव उनकी पुस्तक द लाइटनिंग किड का भी आधार है। ये पांच मिनट के मुकाबले होते थे, जिनमें 10–12 खिलाड़ियों का एक समूह एक ही शतरंज की बिसात के चारों ओर खडा रहता था।
जीतने वाला खिलाड़ी खेलता रहता और हारने वाले को कतार में लगना पड़ता। आनंद ने बताया कि जल्द ही वह अधिकांश मुकाबले जीतने लगे और लगातार खेलते रहते थे यह एक ऐसी लाइटनिंग थी जो पल भर में खत्म नहीं होती थी।
उन्होंने कहा कि लगातार अभ्यास से मस्तिष्क अपने आप पैटर्न पहचानने लगता है। खिलाड़ी को हर चाल पर अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं पडती, दिमाग स्वयं खाली जगहों को भर देता है और खेल स्वाभाविक रूप से आगे बढता है। आनंद ने यह भी कहा कि शतरंज जैसी आमने-सामने की प्रतिस्पर्धा बेहद निजी हो जाती है। जैसे ही खिलाड़ी बिसात के सामने बैठता है, खेल केवल खेल नहीं रह जाता, बल्कि एक मानसिक और भावनात्मक चुनौती बन जाता है।
बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि जीवन में कई विचार ऐसे होते हैं जो हमारी टू-डू लिस्ट में रह जाते हैं, लेकिन उन पर अमल नहीं हो पाता। बाद में यह एहसास होता है कि वही अधूरे विचार सबसे अधिक महत्वपूर्ण थे।
सेशन के अंत में विश्वनाथन आनंद ने कहा कि हर व्यक्ति के जीवन में कम से कम एक ऐसी चीज अवश्य होनी चाहिए, जिसे वह पूरी शिद्दत और जुनून के साथ करे—बिना किसी आर्थिक लाभ की अपेक्षा के। उनके अनुसार, यही जिज्ञासा, रचनात्मकता और मानसिक सक्रियता के वास्तविक औजार हैं, जो इंसान को भीतर से जीवंत बनाए रखते हैं।
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Published on:
16 Jan 2026 12:54 pm
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