
किरोड़ी लाल मीना की मार्मिक अपील, टंकी पर चढी़ बच्चियों के नाम लिखा पत्र
मेरी प्यारी बेटियो,
मन और मष्तिष्क में एक बात को दबाए बैठा था लेकिन आज लोकतांत्रिक संघर्ष की प्रतीक बनीं आप देवियों के जज्बे ने ह्रदय में इस कदर उथलपुथल मचा दी कि ह्रदय में बहुत गहरे में दफन एक वाकिए को आपको बताने के लिए विवश हो गया हूं। कई दशक पहले की बात है। सरिस्का अभयारण्य में पाराशर ऋषि की तपोभूमि में साधना में लीन जहाज वाले मल्ला बाबा के दर्शनों के लिए गया था। कठोर तप में तपने से कृशकाय और महज हड्डियों का ढांचा बनकर रह गए मल्ला बाबा सिद्ध पुरुष थे। दर्शन की बारी आई। साष्टांग नमन किया तो बोले-" डॉक्टर तुझे बेटा दे दूं।" भूत, भविष्य और वर्तमान को जानने की कला के कारण जिन्हें लोग त्रिकालदर्शी कहते थे, उनकी वाणी सुनकर मैं हतप्रभ रह गया। मैं अचम्भित था कि दाम्पत्य जीवन के वर्षों बाद भी मेरे लाऔलाद रहने जैसी बात उन्हें कैसे मालूम हो गई। किंतु प्रत्युत्तर में मैंने बेटा मांगने के बजाय राष्ट्र के जन-जन की सेवा और संघर्ष के लिए सिर्फ़ शक्ति और सामर्थ्य मांगा। बाबा भी बड़े दयालु थे। उन्होंने बेटे के वरदान की बात दोहराने के बजाय तथास्तु कहते हुए मुझ पर शक्तिपात कर डाला।
मेरी बच्चियो, तब से लेकर आज तक मैं संघर्ष की कठिन डगर का स्थायी मुसाफिर हूं। चालीस साल के दौरान किए गए सेकडों आंदोलन इसी तथ्य के साक्षी हैं। पिछले दिनों जैसे ही स्कूल व्याख्याता भर्ती परीक्षा की तिथि आगे सरकाने की मांग को लेकर किए जा रहे आप जैसे अभ्यर्थियों के सार्थक आंदोलन की मुझे जानकारी मिली, मैं आपके पास और साथ था। छह दिनों तक ठिठुरन भरी ठंड में आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर रहा। सड़क पर सोया। वहीं आपके साथ रूखा-सूखा मिला, वो खाया। मैं तो एक पल भी आपसे दूर नहीं हुआ। आज भी आत्मिक, शारीरिक एवं भावनात्मक रुप से आपके साथ और पास हूं।
मैं हतप्रभ हूं। अचम्भित हूं। शीतलहर के भीषण कहर के वक्त भी सत्तारूढ़ सरकार और उसके नेता आपके प्रति इतनी संवेदनहीन और संवेदनशून्य कैसे हो सकती है। सरकार के मुखिया क्यों भूल गए कि इस देश में देवता वहीं निवास करते हैं, जहां नारियों की पूजा होती है? नारी शक्ति के सम्मान की बात करने वाले मुख्यमंत्री क्यों भूल गए कि भीषण सर्दी में बच्चियां किसी फिल्म की शूटिंग के लिए टंकी पर नहीं चढी हैं। हजारों अभ्यर्थी महीने भर से आंदोलनरत हैं और दो बेटियों का टंकी पर चढना सरकार के समक्ष अपनी मांग रखने का हठधर्मिता से पोषित लोकतांत्रिक तरीका माना जा सकता है। किंतु यह कदम किसी भी दृष्टिकोण से अनुचित या अलोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता है। मैं आश्चर्यचकित हूं कि बच्चियों के इस अकल्पनीय और दुस्साहसी कदम के बावजूद वातानुकूलित कमरों में रहने वाले नेताओं के कानों जूं नहीं रेंगी है। जनसेवा का राग अलापने वाले नेता क्या वाकई इतने निष्ठुर और हठधर्मी होते हैं।
मेरी प्यारी बेटियो, मेरे प्रयास में कभी भी कोई कमी नहीं रही। राजस्थान के शिक्षामंत्री और मुख्यमंत्री तक आपकी बात प्रभावी ढंग से पहुंचाई। उन्होंने अनसुनी की तो आपके साथ कांग्रेस के शीर्ष नेता श्री राहुल गांधी से मिलने और आपकी बात को दमदारी से रखने के लिए नई दिल्ली गया। बेटियो, मुझे इस बात से भी काफी तकलीफ पहुंची है कि जिस राज्य का मुखिया नारी की कोख से राजा पैदा होने की बात बार-बार दोहराता हो, क्या उसे उसी नारी शक्ति के भीषण ठंड में ठिठुरने की खबर नहीं है?
प्यारी बेटियो, आप राष्ट्र का भविष्य हैं। हाड कंपकंपा देने वाली भीषण ठंड में आप खुले आसमां के नीचे पानी की टंकी पर चढकर अपना विरोध जता रही हैं। बेशक अन्य नेताओं को आपके कष्ट और दर्द का अहसास नहीं होगा लेकिन मेरे ह्रदय को आपकी तकलीफ से अत्यंत वेदना हुई है। रात को जब भी नींद खुली तो टंकी पर चढी़ बच्चियों की तकलीफ अन्तर्मन को पीड़ा देती रही। मेरी यह आंतरिक पीड़ा किसी भी प्रकार से आपको जन्म देने वाले माता-पिता से कम नहीं है।
मैं बीते कल की भांति आज भी आपके साथ और आपके पास हूं। आपकी जायज मांग को मनवाने के लिए किसी भी हद तक जाने के तैयार हूं। लेकिन बेटियो, मेरी अन्तर्मन से प्रस्फुटित अपील को स्वीकार कर टंकी से नीचे उतर आएं। इस गूंगी-बहरी सरकार के लिए अपने शरीर को कष्ट के तप में इतना न तपाएं कि आपकी जान पर जोखिम बन आए। मैं खुले मन से घोषणा कर रहा हूं यदि आप मेरी अपील को स्वीकार कर टंकी से नीचे नहीं उतरीं तो मुझे टंकी के नीचे रात बिताने को विवश होना पडेगा।
Published on:
01 Jan 2020 07:52 pm
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