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जानिए लॉकडाउन के बीच कैसे मना राजस्थान का पहला ‘पलाश महोत्सव’

जानिए लॉकडाउन के बीच कैसे मना राजस्थान का पहला 'पलाश महोत्सव'प्रकृति ने खुद मनाया पलाश महोत्सव

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जयपुर

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Rakhi Hajela

Apr 06, 2020

जानिए लॉकडाउन के बीच कैसे मना राजस्थान का पहला 'पलाश महोत्सव'

जानिए लॉकडाउन के बीच कैसे मना राजस्थान का पहला 'पलाश महोत्सव'

उदयपुर संभाग में पर्यावरण संरक्षण व संवर्धन गतिविधियों के क्रियान्वयन के लिए ग्रीन पीपल सोसायटी की ओर से प्रस्तावित पलाश महोत्सव भले ही लॉकडाउन के कारण आयोजित नहीं हो पाया हो लेकिन प्रकृति ने पलाश के पेड़ों को फूलों से लकदक करते हुए खुद ही पलाश महोत्सव मना लिया है। जानकारी के मुताबिक वन विभाग और डब्ल्यूडब्ल्यूएफइंडिया के सहयोग से उदयपुर में पहली बार पलाश महोत्सव का आयोजन किया जाना था लेकिन कोरोना के कारण देश भर में लॉकडाउन लागू कर दिया गया जिसके कारण इसका आयोजन नहीं हो सका। ग्रीन पीपल सोसायटी के अध्यक्ष और सेवानिवृत्त मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव राहुल भटनागर ने बताया कि पलाश महोत्सव का आयोजन २१ मार्च को होना तय हुआ था लेकिन फिर इसे४ अप्रेल को प्रस्तावित किया गया और इसके लिए सभी प्रकार की तैयारियां भी कर ली गई लेकिन लॉकडाउन के कारण इसका आयोजन स्थगित कर दिया। उन्होंने बताया कि पलाश महोत्सव शहर से मात्र 20 किलोमीटर की दूरी पर अहमदाबाद मार्ग स्थित ग्राम पंचायत दईमाता गांव में सड़क किनारे स्थित पलाश कुंज में किया जाना था। उन्होंने बताया कि महोत्सव के दौरान भारतीय संस्कृति के बहुत ही उपयोगी व सुंदर वृक्ष पलाश के संरक्षण व संवर्धन के प्रति जागरुकता पैदा करने के लिए चित्रकला व मौखिक क्विज प्रतियोगिता का आयोजन होना था। इसके साथ ही पलाश और इस पर जीवनयापन करने वाले पक्षियों, तितलियों और कीटों के चित्रों पर आधारित फोटो प्रदर्शनी का आयोजन भी प्रस्तावित था जो हम नहीं कर सकें लेकिन प्रकृति ने खुद ही इस कमी को दूर कर दिया।
राहुल ने कहा इन दिनों यह पूरा जंगल पलाश के फूलों से गुलजार है और सभी पेड़ सुर्ख लाल रंग के फूलों से लकदक हैं।
आपको बता दें कि पलाश के फूलों को फ्लेम ऑफ दी फॉरेस्ट या जंगल की ज्वाला भी कहा जाता है और इन दिनों जब पूरा का पूरा जंगल सिर्फ पलाश के सुर्ख लाल रंग के फूलों से भरा हुआ है तो यह क्षेत्र जंगल की ज्वाला की उपमा को सार्थक कर रहा है। इन स्थितियों में ऐसा लग रहा है कि ग्रीन पीपल सोसायटी की ओर से पलाश महोत्सव मनाने की पहल को अपनी सहमति देते हुए प्रकृति ने ही इन फूलों को दुगुने सौंदर्य के साथ पुष्पित करते हुए खुद ही महोत्सव को आयोजित कर लिया।
इनकी खासियत यह है कि वसंत में जहां इनके फूल हर ओर छाए रहते हैं वहीं होली के खत्म होने के बाद इनके फूल उतरने लगते हैं। मुख्य रूप में इनका उपयोग जहां गुलाल और अबीर बनाने के लिए किया जाता है, वहीं टेसू के फूलों का उपयोग लोगों के लिए औषधि के रूप में होता है।
ग्रामीणों द्वारा टेसू के पत्तों का उपयोग पत्तल और दोनों तक ही सीमित रहा है लेकिन अब वे भी इनका उपयोग औषधि और कॉस्मेटिक की तरह करने लगे हैं। सिर्फ टेसू ही नहीं गेंदा, गुलाब, ऑलिविया और ऑर्किड जैसे फूल भी औषधि के रूप में काम आते हैं। जो न सिर्फ रंग बनाते हैं, बल्कि सेहत और काया भी निखारते हैं।

ये हैं औषधीय फायदे .टेसू के फूल के सेवन से एनर्जी मिलती है शरीर में पानी की कमी पूरी होती हैटेसू के फूल शरीर में बल्ड बढ़ाने का काम करता है। बुखार में टेसू का उपयोग किया जाता है। उदर रोगों के लिए टेसू के फूल रामबाण का काम करते हैं।आंखों से जुड़ी बीमारियां ठीक होती हैं। टेसू के उपयोग से रतौंधी की समस्या से निजात मिलती है। टेसू का सेवन ब्लड सर्कुलेशन कंट्रोल करने का काम करता है।
इस फूल को उबालने से एक प्रकार का लाल और पीला रंग निकलता है जो कि होली के लिए प्रयोग किया जाता है, फूलों की बची हुई चीजों से अबीर भी बनता है, ब्यूटी कॉस्मेटिक्स में टेसू के चूर्ण का उपयोग बढ़ा है, कपड़ों के रंगाई में फूलों के रंग काम आते हैं।