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जानिए! राजस्थान की इस राजपूत क्षत्राणी कहानी- इसलिए निशानी के रूप में अपना सिर काट रणभूमि में भिजवा दिया…

रानी ने संदेश वाहक को कहा कि अब मैं तुम्हें संदेश के साथ अपनी अंतिम निशानी दे रही हूं, इसे ले जाकर राव चुण्डावत रतन सिंह को दे देना।

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जयपुर

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Punit Kumar

Sep 07, 2017

hadi rani of salumber udaipur

राजस्थान केवल एक राज्य का नाम ही नहीं बल्कि अपने आप में वीरता और शौर्य की एक लंबी कहानी का संग्रह भी है। अगर यहां के वीर पुत्रों की बात करें तो दुनिया के हर कोने में इनका जिक्र बड़े ही अदब से लिया जाता है, इतना ही नहीं इतिहास की नजर से देखें तो जहां एक तरह इस धरती ने महाराणा प्रताप जैसे वीर के लिए जाना जाता है, तो वहीं यहां कई ऐसी वीरांगनाएं भी थी, जिनकी मिसाल आज भी दी जाती है। इन्हीं नामों में से एक नाम थी हाड़ी रानी का। तो वहीं इनके वीरता और अमर बलिदान की गाथा आज भी राजस्थान के अंचलों में सुनाई देती है।

राजस्थान खासकर मेवाड़ के स्वर्णिम इतिहास में हाड़ी रानी को विशेष स्थान दिया गया है। इतना ही नहीं इनके वीरता और बलिदान से प्रभावित होकर इस वीरांगना के नाम पर राजस्थान पुलिस में एक महिला बटालियन का गठन किया गया। जिसका नाम हाड़ी रानी महिला बटालियन रखा गया है। आज हम आपको इस बलिदानी हाड़ी रानी के इतिहास के रुबरु करवा रहे हैं...

दरअसल, यह कहानी 16वीं शताब्दी की है, जब मेवाड़ पर राजा राज सिंह का शासन था। जिनके सामन्त सलुम्बर के राव चुण्डावत रतन सिंह थे। रतन सिंह की शादी उसी दौरान हाड़ा राजपूत सरदार की बेटी हाड़ी रानी से हुई थी। अभी शादी के ज्यादा दिन भी नहीं हुए थे कि चुण्डावत रतन सिंह को महाराणा राज सिंह का संदेश मिला, जिसमें रतन सिंह को दिल्ली से ओरंगजेब की मदद के लिए आ रही अतिरिक्त सेना को किसी भी हाल में रोकने का निर्देश था। तो उधर रानी की हाथों की मेहंदी भी नहीं सूखी थी और ऐसे में युद्ध पर जाने का फरमान रतन सिंह के लिए काफी मुश्किल भरा आदेश था। बावजूद इसके राव चुण्डावत रतन सिंह ने अपनी सेना को युद्ध की तैयरी के आदेश तो दे दिए, लेकिन राव हाड़ी रानी से इतना प्रेम करते थे की एक पल भी दूर रहना गंवारा नहीं था। ऐसे में जब हाड़ी रानी को इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने अपने पति राव रतन सिंह को युद्ध पर जाने के लिए तैयार किया और विजय की कामना करते हुए उन्हें विदा कर दी।

इसके बाद रतन सिंह सेना के साथ महल से कूच कर गए, लेकिन उनका ध्यान अब भी रानी की ओर ही लगा था। फिर उन्होंने अपने एक सेना को हाड़ी रानी के पास भेजा और रानी का संदेश लाने को कहा। संदेश वाहक ने रानी को रतन सिंह का संदेश दिया और उसके बाद रानी ने उसे आश्वस्त कर राजा के पास जाने को कहा। लेकिन इसके बाद भी राव का मन जब हल्का नहीं हुआ तो उन्होंने फिर रानी के पास एक संदेश वाहक भेजा, ऐसे इस बार हाड़ी रानी संदेश पढ़कर सोच में पड़ गईं। उन्हें लगा कि युद्ध की स्थिति में पति का मन यहां लगा रहेगा तो विजय श्री को कैसे प्राप्त करेंगे।

तब रानी ने संदेश वाहक को कहा कि अब मैं तुम्हें संदेश के साथ अपनी अंतिम निशानी दे रही हूं, इसे ले जाकर राव चुण्डावत रतन सिंह को दे देना। इसके बाद उन्होंने अपने हाथ से ही अपना शीश काट सैनिक से साथ भिजवा दिया। अपने प्यार में दिग्भ्रमित हुए पति को कर्तव्य की ओर मोड़ने और एक सैनिक का फर्ज निभाने के लिए रानी द्वारा लिया गया निर्णय सदा के लिए अमर हो गया। और हाड़ी रानी जैसी वीरागंना इस वीर धरती के लिए बलिदान की एक अनूठी मिसाल बन गई। जिनका नाम आज भी बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है।

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