
nagaur
नागौर।धोती,कुर्ता व पगड़ी पहने पुरुष तथा घाघरा-ओढऩी में सजी-धजी महिलाएं। हजारों की संख्या में उपस्थित स्वयंसेवक। जी, हां, यह नजारा किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम का नहीं बल्कि शारदापुरम् में चल रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सभा के समापन अवसर पर देखने को मिला। परम्परागत परिधानों में सजे जोड़ों के हाथों में देसी व्यंजन खीच व गळवाणी देख बाहर से आए स्वयंसेवक मेहमान खुद आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सके। शहर के करीब 150 स्वयंसेवक परिवारों के 300 महिला-पुरुषों ने भोजन वितरण व्यवस्था संभाली।
समरसता का अच्छा उदाहरण
कर्नाटक के हुबली से आए संघ के पदाधिकारी ने कहा कि सामाजिक समरसता का इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है। जब शहर के हर जाति व वर्ग से जुड़े स्वयंसेवकों के परिवारों ने खाना परोसा हो। एेसा उदाहरण संघ के अलावा और कहीं देखने को नहीं मिलता। स्वयंसेवकों ने कहा कि बाजरी से बनने वाले देसी व्यंजन खीच व गुड़ से बनी गळवाणी का स्वाद कभी नहीं भूलेंगे।
महिलाएं भी बनीं भागीदार
सामान्य तौर पर संघ में परम्परा है कि संघ शिविर व कार्यक्रमों में वहां मौजूद स्वयंसेवकों को ही भोजन वितरण की जिम्मेदारी दी जाती है। संघ ने पहली बार अनूठा प्रयोग करते हुए शहर के स्वयंसेवकों व उनके परिवार के लोगों को भोजन वितरण की जिम्मेदारी दी। पहली बार शहर के स्वयंसेवकों के परिवारों की महिलाओं ने भी भोजन वितरण व्यवस्था में भागीदार बनकर जाना कि किस प्रकार उनके पति, पुत्र या भाई भोजन वितरण की जिम्मेदारी सम्भालते हैं।
पान मैथी व गुलाल खरीदी
तमिलनाडू से आए स्वयंसेवकों की मांग पर होली खेलने वाला गुलाल उपलब्ध करवाया गया। बाहर से आए पदाधिकारियों के परिवार की महिलाओं का कहना था कि फिल्मी परदे पर राजस्थानी संस्कृति को देखा है। उसमें होली पर उडऩे वाला गुलाल भी शामिल है। उनकी मांग पर शहर के स्वयंसेवकों ने बाजार से गुलाल मंगवाकर दिया। महिलाओं ने चूडिय़ां व रसाई में जायके में चार चांद लगाने वाली पान मेथी खरीदी।
गर्व महसूस हो रहा
मायके व ससुराल दोनों ही घरों का संघ परिवार से गहरा नाता रहा है। पति व बच्चे भी शाखा में जाते हैं। समय-समय पर आयोजित होने वाले संघ के कार्यक्रमों में भोजन पैकेट बनाने तक ही सीमित रहती थी, लेकिन आज मैं खुद भोजन वितरण व्यवस्था का हिस्सा बनकर गर्व अनुभव कर रही हूं। - संघ परिवार से जुड़ी एक महिला
धर्मेन्द्र गौड़

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