
Ustad Zakir Hussain: उस्ताद जाकिर हुसैन जब भी जयपुर आते थे तो उनसे अक्सर मुलाकातें होती रहती थीं। इन मुलाकातों में संगीत जगत से लेकर हंसी मजाक की बातें भी शामिल थीं। वर्ष 2019 में फरवरी माह में जयपुर आए तो चिरपरिचित अंदाज में बोले कि हम दोनों अब बूढ़े हो चले हैं, फिर भी मैं आपसे तीन-चार साल बड़ा हूं। मैंने तपाक से कहा, तभी तो लोग आपके नाम से पहले उस्ताद लगाने लगे हैं, लेकिन आपको उस्ताद कहलाना पसंद नहीं। उन्होंने कहा, कलाकार के नाम के आगे उस्ताद लगाने से वह कला सीखने की प्रकिया से दूर होता जाता है। इसीलिए मैं मरते दम तक तबला सीखते रहना चाहता हूं।
जाकिर हुसैन जब भी निजी यात्रा पर जयपुर आते थे तो आमेर में कलाकार हामिद कावा के यहां जरूर ठहरते थे। अपने परिवार की एक शादी में उन्होंने कावा के क्लासिकल बैंड का प्रोग्राम रखवाया था। उन्हें आमेर की गुंजिया काफी पसंद थीं। जाकिर हुसैन तबले के फरिश्ते भी इसलिए कहलाते थे कि तबले की गणित का ऐसा ज्ञान रखने के बावजूद वह विनम्रता की मूरत थे।
एक बार संगीत चर्चा के दौरान मैंने पूछा कि जयपुर के तबला वादकों में आपको क्या कोई अच्छा लगता है तो उनका जवाब था कि जयपुर तो संगीत का घराना है। यहां एक से एक गुणी कलाकार हुए हैं, अगर तबले की बात करें तो यहां उस्ताद हिदायत खां का जवाब नहीं था। जाकिर हुसैन दुनिया भर में न केवल तबले के पर्याय बन गए थे बल्कि उन्हें तबले की दुनिया का फरिश्ता भी कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
कला के साथ-साथ उनकी विनम्रता ने भी कला प्रेमियों को अपना मुरीद बना लिया था। उस्ताद जाकिर हुसैन के पिता तबला नवाज उस्ताद अल्लाह रक्खा खान ने एकल तबला वादन के साथ-साथ ए.आर. कुरैशी के नाम से सिने जगत में बतौर यूजिक डायरेक्टर बहुत नाम कमाया था। उनके भाई भी अपने खानदान की परंपरा को ना केवल आगे बढ़ा रहे हैं बल्कि अल्लाह रक्खा खान के घराने का नाम रोशन कर रहे हैं। जाकिर हुसैन सब के दिलों में जिंदा रहेंगे, तबले के फरिश्ते को आखिरी सलाम।
-इकबाल खां,
वरिष्ठ कला समीक्षक
Updated on:
16 Dec 2024 10:33 am
Published on:
16 Dec 2024 10:31 am
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