जयपुर। शक्ल और आवाज से मरहूम गजल सम्राट जगजीत सिंह की अनुभूति करवाने वाले गजल गायक डौ. अनिल शर्मा रविवार को मंच पर आए और उन्होंने जैसे ही जगजीत सिंह की शैली में लोगों को राम-राम कहा तो संपूर्ण परिसर मानों जगजीत मय हो गया। मंच पर बैठे अनिल शर्मा के चेहरे और आवाज में तो जगजीत सिंह का अक्स था लेकिन उनकी आंखों में लंपी गायों के प्रति वेदना के भाव सहज ही महसूस किए जा रहे थे। अनिल शर्मा ने ये कार्यक्रम समाज सेवी धर्मेन्द्र छाबड़ा, कमल सेठिया और जय शर्मा के सहयोग से आयोजित किया। उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम में प्रवेश बिलकुल नि:शुल्क रखा गया था लेकिन संगीत प्रेमियों द्वारा स्वेच्छा से किए सहयोग की राशि का एक.एक पैसा लंपी रोग से पीडि़त गायों की सेवार्थ समर्पित किया जाएगा। कार्यक्रम का उद्घाटन जगजीत सिंह के भाई जसवंत सिंह और अनिल के गुरु पंडित दिनेश गोस्वामी ने दीप प्रज्जवलित कर किया।
दो घंटे चला जगजीत सिंह और खुद की रचित गजलों का दौर
ये कार्यक्रम आमतौर पर कार्यक्रमों में होने वाली औपचारिकताओं से परे थे। कार्यक्रम बिना किसी नारे, ढंढोरे अथवा भाषण के दीप प्रज्जवन की रस्म के साथ ही शुरू किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत अनिल ने जगजीत सिंह के भजन मेरे मन के अंध तमस में ज्योतिर्मय उतरो गाकर कीण् इसके बाद उन्होंने अपनी रूहानी आवाज के ओज से निदा फाजली की चर्चित गजल होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज है, हस्ती मल हस्ती की प्यार का पहला ख़त लिखने में वक्त तो लगता है, मिर्जा गालिब की हजार ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले, आनंद बख्शी की चि_ी ना कोई संदेश जैसी गजलों को उसी अंदाज में गाकर मरहूम जगजीत सिंह की याद ताजा कर दी। इस मौके पर अनिल ने ख़ुद की लिखी और स्वरबद्ध की गई रचनाएं भी पेश कीं। ऐसी रचनाओं में वक्त.ए.नाजुक में भी अपनों का सहारा ना मिला और जिंदगी रोज तेरा दर्द जिया है मैनें, सहित अनेक रचनाएं ऐसी थीं जिनमें अनिल शर्मा ने जगजीत सिंह से हटकर अपनी बेहतरीन मौलिक शैली का भी प्रदर्शन कर श्रोताओं की जमकर दाद बटोरी। उनके साथ गिटार पर संजय माथुर, तबले पर सावन डांगी, वॉयलिन पर अशोक कुमार और की.बोर्ड पर सुजात हुसैन ने संगत की। कार्यक्रम का संचालन डॉ.राजेश मान ने किया।