
Muharram : जयपुर के सुभाष चौक क्षेत्र में शिया समाज की मजलिस को सम्बोधित करते धर्मगुरु। फोटो पत्रिका
Rajasthan Muharram : हजरत इमाम हुसैन अले सलाम की याद में मोहर्रम के तहत जयपुर में शुक्रवार को दिनभर अकीदतमंदों की ओर से रोजे रखकर इबादत की जाएगी। सुबह से अकीदत के साथ ताजियों का जुलूस निकलेगा। शाम तक ताजिए चांदपोल, छोटी-बड़ी चौपड़ और जोरावर सिंह गेट होते हुए कर्बला पहुंचेंगे। जहां इन्हें सुपुर्दे-ए-खाक किया जाएगा। इससे पूर्व मोहर्रम की नौवीं तारीख को शहादत की रात पर गुरुवार देर रात तक शहर में मजलिसों का दौर जारी रहा। इसके बाद ताजिए अपने-अपने मकाम से बड़ी चौपड़ के लिए निकले। पूरे शहरभर से 320 से अधिक ताजिए जुलूस के रूप में शामिल हुए।
मुहर्रम के दौरान जयपुर में बनाए गए ताज़िए आकर्षण का केंद्र बन गए हैं। जयपुर के शाही परिवार के सोने और चांदी के ताज़ियों के साथ-साथ, 20 फ़ीट ऊंचा ताज़िया भी आकर्षण का केंद्र है। राजस्थान की पिंक सिटी में ताजिया बनाने वाले सलमान कहते हैं, ताजिया बनाने में 1.5 से 2 लाख रुपए का खर्च आता है और इसे तैयार होने में दो महीने लगते हैं। ताजिया जयपुर में इसलिए मशहूर है क्योंकि लोग कहते हैं कि यहां मन्नतें पूरी होती हैं।
इधर शिया समुदाय की ओर से शुक्रवार सुबह 9.30 बजे शेरपुर हाउस मेहरों की नदी में मजलिस होगी। इसके बाद अलम और ताजियों के साथ जुलूस निकलेगा। जुलूस के शाम चार बजे कर्बला पहुंचने पर जहां शिया समुदाय की अंजुमने मातम करेंगी।
जौहरी बाजार, हल्दियों का रास्ता में सलीम मंजिल ऊंचा कुंआ में शहीदे कर्बला हजरत इमाम हुसैन की कुलाहे मुबारक (टोपी) की जियारत के लिए अकीदतमंद पहुंचे। ट्रस्टी मोईनुद्दीन हुसामुद्दीन खान ने बताया कि यहां शुक्रवार शाम तक जियारत की जा सकेगी। गौरतलब है कि दुनिया में शहीदे कर्बला की कुलाहे मुबारक जयपुर में है।
शहीदे कर्बला हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) की कुलाहे मुबारक जयपुर में सलीम मंजिल में संरक्षित है। यह पवित्र टोपी लगभग 145 वर्ष पुरानी है। सन् 1876 में अफगानिस्तान के बादशाह ने जयपुर के प्रसिद्ध हकीम सलीम खान को उपहार स्वरूप भेंट की थी, जिन्होंने बादशाह के पुत्र का इलाज किया था।
जौहरी बाजार के हल्दियों के रास्ते स्थित ऐतिहासिक सलीम मंजिल में मुहर्रम की 9 और 10 तारीख को इसकी ज़ियारत खुली रहती है। कांच के फ्रेम में रखी यह कुलाह इत्र व फूलों से महकते हॉल में रखी जाती है। हज़ारों अकीदतमंद दूर-दूर से मुराद लेकर आते हैं। यह विरासत परिवार द्वारा अमानत की तरह संभाली जा रही है और शिया-सुन्नी एकता का प्रतीक है।
Updated on:
26 Jun 2026, 10:18 AM IST
Published on:
26 Jun 2026, 10:18 AM IST
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