जयपुर

बचपन से अपना आकर्षण नहीं बना पा रही हिन्दी- नासिरा शर्मा

जो प्रवासी लेखक आज अपनी पहचान बना हिन्दी में छपने और पुरस्कार पा रहे हैं उनकी दूसरी पीढ़ी हिन्दी से अपना कोई सम्बन्ध न मातृभाषा के रूप से न साहित्यिक भाषा के रूप में बना पाई। बोलती भी है तो लड़ख़ड़ाती और गलत व्याकरण के साथ हिन्दी के अजीब व गरीब उच्चारण के साथ।

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नासिरा शर्मा, हिन्दी की वरिष्ठ साहित्यकार

हिन्दी भाषा की चुनौतियां, उसकी वर्तमान स्थिति और उसके विकास को यदि हम भविष्य के आईने में एक लेखक के नजरिए से देखते हैं तो महसूस होता है कि जो काम पिछले पचास साठ वर्षों में हो जाने चाहिए थे उनकी तरफ हमारा ध्यान नहीं जाता है । हिन्दी आज हमारी नई पीढ़ी के बीच इतनी लोकप्रिय क्यों नहीं है? क्या हमारे बच्चे हिन्दी के प्रति उतना लगाव महसूस नहीं करते जितना उन्हें करना चाहिए। क्या इसलिए कि उनकी पाठ्यक्रम की किताबें फीकी और बदरंग हैं या पाठ्यक्रम रोचक नहीं है या फिर मौलिक व वैज्ञानिक बाल साहित्य उनकी रुचि और समय के अनुसार उन्हें मिलता नहीं है। आखिर क्या कारण है कि हिन्दी अपना आकर्षण और पुख्तगी बुनियादी तौर पर बचपन से नहीं बना पा रही है? क्या इसका कारण केवल अंग्रेजी मध्यम के शानदार स्कूल हैं और हिन्दी माध्यम के बुरे हाल के स्कूल, जहां अध्यापक भी अपने कर्तव्य में कोताही बरतते हैं। किसी भाषा में बोलना भर ही उसके विकास की गारंटी नहीं है बल्कि उस भाषा में कैसे विषय उठाए जा रहे हैं, जो समय के साथ बच्चों को वैश्विक स्तर पर सचेत बना रहे हो। ऐसा है नहीं।

हिन्दी की किसी भारतीय भाषा से नहीं प्रतिस्पर्धा

दूसरी बात यह है कि हिन्दी की प्रतिस्पर्धा किसी भी भारतीय भाषा से नहीं है । लेकिन हिन्दी भाषा को लेकर राजनीति करने वाले या केवल अपनी भाषा तक सीमित रहने वाले जो संकीर्णता दिखाते हैं वह हिन्दी भाषा के लाभ में नहीं नुकसान में जाती है और जबकि स्वयं हिन्दी भाषा खुले मन से अनुवाद के द्वारा अन्य भाषाओं का साहित्य छापने में झिझकती नहीं और उन सभी लेखकों का स्वागत करती है जो अपनी मातृभाषा में नहीं हिन्दी में लिखते हैं और अपने परिवेश के साथ नए शब्दों को भी कहानी,उपन्यास, लेखों के द्वारा हिन्दी का शब्द भंडार बढ़ाते हैं। इस तरह हिन्दी जुड़ाव की भाषा है।

भारत के हर प्रान्त की अपनी भाषा है और सभी चाहते हैं कि उनकी मातृभाषा को महत्त्व दिया जाए। सही भी है मगर विभिन्न भाषाओं को एक साथ तो माध्यम की भाषा बनाना मुमकिन नहीं है इसलिए हमें दो ऐसी भाषाओं को चुनना पड़ेगा जो देश और विदेश के बीच सम्पर्क बनाने में महत्त्वपूर्ण हो। गांधी जी ने उसे हिंदुस्तानी भाषा का नाम दिया था जो आम बोलचाल की जबान हो जिसे माध्यम की भाषा या सम्पर्क की भाषा कह सकते हैं। लेकिन हो यह रहा है कि कुछ लोग किसी भी अन्य भाषा के शब्दों को हिन्दी में प्रयोग होता देख उखड़ जाते हैं जो उचित नहीं है। जबान के मुहावरे इकहरे रूप से प्रयोग होने लगे तो वह भाषा के मुर्दा पड़ जाने के खतरे को दर्शाने लगती है।

हिन्दी सम्मेलन, हिन्दी प्रचार के सिलसिले से जो समितियां और कमेटियां बनी हैं उन्होंने हिंदी को जैसे गोद ले लिया है और कुछ चेहरे हिन्दी सेवकों के नाम से हमारे सामने बार बार आते हैं। कुछ चुने लेखक,कुछ अंग्रेजी दां ऑफिसर, कुछ सरकारी लोग। हर वर्ष विदेशी यात्राएं होती हैं। बुलाए गए लोग आपस में मिलते हैं मगर इस मिलन का सकारात्मक नतीजा कुछ न कुछ निकलता होगा जिसके बारे में हम सब को ज्यादा पता नहीं चल पाता मगर कुछ बातें और प्रश्न जहन में उभरते हैं जैसे भविष्य को लेकर ऐसा कुछ नजर नहीं आता जिससे हमारा हौसला बढ़े। बतौर मिसाल विदेशों में हिन्दी (भारतीय भाषाओं) पुस्तक के खरीद के लिए कोई केंद्र कोई बुकशॉप नहीं है सिवाय एमेजॉन या डाक सुविधा के अलावा।

भारत के रेलवे स्टेशनों को छोड़ कर किसी भी हवाई अड्डों पर बड़े बड़े मॉल होटल और मोहल्ले में आपको हिन्दी की पुस्तकें सजी नजर नहीं आएंगी, मगर अंग्रेजी की जरूर सजी रहेंगी, आखिर क्यों? सियासी नेताओं की मूर्तियों के अलावा चौराहों पर और सडक़ों के नाम लेखकों के नाम पर नहीं हैं जबकि लेखक आम पाठक तक अपनी लेखनी के जरिए पहुंचता है और हिन्दी को किसी भी सरकारी एजेंडे और हिन्दी सेवकों से कई गुना दूर-दूर तक पहुंचाता है मगर अपवाद को छोड़ कर क्या उस लेखक का मेहताना भी उसे गरिमापूर्ण या टोकन के नाम पर मिल पाता है जो देश के इतिहास, संस्कृति, सभ्यता,आम इंसानों के सुख दुख और भविष्य में आने वाले संकटों की चेतना अपने देशवासियों को मुहैया कराता है। अपनी सृजनात्मकता से लगातार भाषा को तराशता, सजाता,नई अभिव्यक्तियों और अनुभूतियों से हिन्दी भाषा को विस्तार देता है।

जो प्रवासी लेखक आज अपनी पहचान बना हिन्दी में छपने और पुरस्कार पा रहे हैं उनकी दूसरी पीढ़ी हिन्दी से अपना कोई सम्बन्ध न मातृभाषा के रूप से न साहित्यिक भाषा के रूप में बना पाई। बोलती भी है तो लडखड़़़ाती और गलत व्याकरण के साथ हिन्दी के अजीब व गरीब उच्चारण के साथ। वहां बसे लेखकों ने अपना कोई सम्पर्क स्थानीय लेखकों के साथ साधा नहीं, सिवाय इस बात को लेकर कि सदाचरण के चलते किसी विदेशी नेता को अपनी हिन्दी गोष्ठी में कुछ देर के लिए बुला लेना और उनके मुख से नमस्ते कहलवा देना। यह सारी बातें उस समय शिद्दत से याद आती हैं जब किसी त्योहार की तरह हिन्दी पखवाड़े की धूमधाम शुरू हो जाती है। यहां पर मैंने केवल हिन्दी भाषा को लेकर प्रश्न उठाए हैं इसलिए अन्य भारतीय भाषाओं का कोई भी उदाहरण पेश नहीं किया है जिनको हिन्दी भाषा की तरह सहुलियतें दरकार नहीं हैं। उनके पास न इतनी संख्या में प्रकाशक हैं और न पुस्तक विक्रेता न ही पाठक। इसलिए हिन्दी से उम्मीद बंध जाती है कि वह एक मिसाल सामने रखे। जो बात अक्सर मुझे बेचैन करती है वह है क्लासिक भारतीय लेखन का विश्व के स्तर पर संज्ञान न लेना। यूनेस्को द्वारा फ़ारसी साहित्य के क्लासिक कवियों व लेखकों की रचनाएं विश्वयापी स्तर पर पर्व मनाना जैसे शाहनामा का पांच वर्ष मनाया गया जिसमें बेशुमार बुद्धिजीवियों, शोधकर्ताओं,अध्यापकों,आलोचकों एवं अनुवादकों का शामिल होना था जिस में मैंने भी उसकी दस बेहतरीन काव्यखंड का हिंदी में अनुवाद किया था । किसी भी भारतीय रचना को अभी तक यह सम्मान नहीं मिला। भले ही विदेशों में हिंदी भाषा विभाग विश्वविद्यालयों में खुल गए हो । विश्व के तीन महान एपिक कृतियों के नाम एक साथ लिए जाते हैं महाभारत, शाहनामा और होमर का इलियट प्रोडिसी।

हिन्दी पखवाड़े में सब से ज़्यादा ध्यान बच्चों और किशोरों की तरफ़ देकर उन्हें हिन्दी-भाषा की तरफ आकर्षित करना चाहिए। मुझे याद है कि बाल-भवन की जब मैं सदस्य थी तब मैंने ‘सुनो कहानी,लिखो कहानी’ की शुरुआत की थी जिसके लिए चिल्ड्रन कॉर्नर के नाम पर एक कमरा बाल-पुस्तकों व दीवारों पर चित्रों के साथ सजाया गया था। वहां स्कूलों के बच्चे आते थे। कहानी लिखते , पढ़ते और फिर उन कहानियों की पुस्तक निकलती। मुझे याद है कि बच्चों व किशोरों को पुस्तक पढऩा व कहानी लिखने की आदत सी पड़ गई थी। खाली समय में वह वहां आकर बैठते थे और मेरे न रहने पर कहानी लिख कर रख जाते थे। यह सारा काम हिन्दी में होता था। इस समय सारा जोर हिन्दी को आगे बढ़ाने का उस स्तर पर किया जाता है जहां बुनियाद किसी और भाषा-बोली की पड़ चुकी होती है जब कि जरूरत है हमें बिना पक्षपात और दूसरी भारतीय भाषाओं से अलगाव की भावना को उभारे बिना स्वयं हिन्दी के प्रति प्रेम की बुनियाद डालना है।


कुछ लोगों का विश्वास है कि हिन्दी के प्रति प्यार की नहीं बल्कि काम की जरूरत है। अर्थात नौकरी कि संभावना का बढऩा और जब तक से संभावनाएं बढ़ेंगी नहीं तब तक हिन्दी के प्रति लगाव नहीं बढ़ेगा। ये बात किसी हद तक सही हो सकती है लेकिन पूरी तरह नहीं , क्योंकि जीवन यापन के लिए विभिन्न क्षेत्रों में नौकरियां हासिल कि जा सकती हैं, लेकिन भाषा के प्रति सम्मान और प्यार केवल आम आदमी से हासिल नहीं किया जा सकता।
- नासिरा शर्मा, हिन्दी की वरिष्ठ साहित्यकार

नासिरा शर्मा, हिन्दी की वरिष्ठ साहित्यकार
Published on:
13 Sept 2024 06:26 pm
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