
मोहित शर्मा.
जयपुर. दवा विकास में क्रांति की दिशा में अमरीका ने बड़ा कदम उठाया है। फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ( FDA ) जानवरों पर टेस्टिंग को धीरे-धीरे खत्म कर रही है और इसके बजाय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI ), ऑर्गेनॉइड्स तथा ऑर्गन-ऑन-ए-चिप जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाने जा रही है। लेकिन भारत के विशेषज्ञों का मानना है कि इन नए तरीकों पर 100 प्रतिशत निर्भरता जोखिम भरा है, क्योंकि ये अभी पूरी तरह विश्वसनीय नहीं हैं।
FDA की 2025 की घोषणा और रोडमैप के मुताबिक, मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज जैसी दवाओं के प्री-क्लिनिकल टेस्टिंग में अब एआई-बेस्ड मॉडल्स, लैब में विकसित ह्यूमन ऑर्गेनॉइड्स और ऑर्गन-ऑन-ए-चिप तकनीक को प्राथमिकता मिलेगी।
ये तरीके इंसानी शरीर की बेहतर नकल कर सकते हैं, जिससे रिजल्ट ज्यादा सटीक हो सकती हैं। नतीजा, दवा विकास तेज, लागत कम और जानवरों पर प्रयोग न्यूनतम। एफडीए मॉडर्नाइजेशन एक्ट 2.0 (2022) के तहत यह बदलाव अनिवार्य नहीं, बल्कि वैकल्पिक है। अगले 3-5 सालों में एनिमल स्टडीज शायद सिर्फ अपवाद रह जाएंगी। एफडीए कमिश्नर ने इसे "जन स्वास्थ्य और नैतिकता की जीत" करार दिया है। पायलट प्रोजेक्ट्स शुरू हो चुके हैं, जो कैंसर और ऑटोइम्यून बीमारियों की दवाओं के लिए क्रांतिकारी साबित हो सकते हैं।
हैदराबाद स्थित Indian Council of Medical Research - National Animal Resource Facility for Biomedical Research (ICMR-NARFBR) केडायरेक्टर डॉ. मुकेश कुमार गुप्ता ने बताया की एआई और NAMs (न्यू अप्रोच मेथडोलॉजीज) बहुत अच्छे विकल्प हैं, लेकिन इन पर पूर्ण निर्भरता फ़िलहाल संभव नहीं है। एनिमल मॉडल्स अभी भी जरूरी हैं, क्योंकि नए तरीके पूरी जैविक प्रणाली की नकल नहीं कर पाते। स्टैंडर्डाइजेशन, दोहराव और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में अभी बड़ी चुनौतियां हैं। भारत में NAMs को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन मजबूत एनिमल रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर को छोडऩा जल्दबाजी होगी। ICMR-NARFBR उच्च गुणवत्ता वाले SPF एनिमल्स उपलब्ध कराता है और नैतिक नियमों का सख्ती से पालन करता है।
एनिमल और NAMs का हाइब्रिड मॉडल अपनाएं, ताकि दवा सुरक्षा से कोई समझौता न हो। यह बदलाव दवा उद्योग को नई दिशा देगा, लेकिन सावधानी बरतना जरूरी है। भारत जैसे देशों में संतुलित रास्ता ही भविष्य की कुंजी है।
ड्रग डवलपमेंट के लिए एनीमल में प्री-क्लिनिकल एवं उसके बाद क्लिनिकल ट्रायल होना जरूरी है। तभी जाकर ड्रग के प्रभाव की सटीकता, प्रमाणिकता एवं उसके प्रभाव से होने वाले अन्य दुष्प्रभावों के बारे में सही तौर पर पता चलता है। एआईएमएल से सटीक प्रमाणिकता पूर्ण रूप से सिद्ध नहीं की जा सकती।
प्रो. प्रताप चंद माली, विभागाध्यक्ष प्राणी शास्त्र विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर
Updated on:
11 Jan 2026 01:02 pm
Published on:
11 Jan 2026 12:59 pm

बड़ी खबरें
View Allजयपुर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
