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साहब, क्या- क्या सुनें

कोरानो के कहर ने कई लोगों को दर बदर कर दिया है। इस विपदा से जुड़ी विभिन्न परेशानियों को दर्शा रही है यह कविता।

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साहब,  क्या- क्या सुनें

साहब, क्या- क्या सुनें

कविता
आभा सिंह

ओ भैया
तुम्हें थामना चाहती है
वह सोच जो बांट ले
तुम्हारे दुख दर्द
पर तुम हो
कि भागे जा रहे हो
तनिक रुको
सुनो तो सही।

साहब, क्या- क्या सुनें
लाकडाउन में
सुनते ही बीत रही।
अचानक फरमान सुने
मालिकों के तीर कमान सुने
देने के नाम पर
झाूठे बहाने सुने
ढेरों अपमान सुने

नौकरी खतम पगार खतम
पैसे राशन सब खतम हुए
घबराहट का एक तूफान
कहां जाएं कैसे जीएं।

कोई साथ नहीं
इस विपदा ने
छीन लिए
शहर के सपने
जो बरसों देखे
मान के अपने
अब जाना
कितने बेगाने थे वे
और हम अनजाने थे।

अब क्या बचा
सोच के चल पड़े पैदल ही
हमारे बस में यही था
पैदल चलते- चलते
लाल हो गए हाइवे
छालों से भर गए
हौसलों के कलेजे।

बचपन जवानी बुढ़ापा
सब खप रहे हैं
ऐसे ही दूरियां नापते।

न जाने कहां खो गए
हमारे गांव
सपने झाुलस रहे
नंगे पांव।

अब न लौटेंगे
निर्मोही आशाओं में
झाूठे महलों की
कोरी दिलासाओं में।

दो जून के टुकड़े
वहीं पर जुटा लेंगे
मेहनत तो इतनी ही
करनी है वहां पर
कर लेंगे
शायद कुछ
नया बना लेंगे
आशियाने के सुख तो
उठा लेंगे
बेगाने हो गए गांव को
अब अपना बना लेंगे
अब अपना बना लेंगे।