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राष्ट्रपति बनने से पहले पाटिल ने भी रोका था विधेयक, विधानसभा से पारित विधेयक को राज्यपाल द्वारा रोकने का मामला

कृषि विधेयकों को रोकने के कारण राज्यपाल कलराज मिश्र इन दिनों कांग्रेस के निशाने पर हैं, लेकिन 13 साल पहले तत्कालीन राज्यपाल प्रतिभा पाटिल ने भी धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को एक साल रोक लिया था।

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File Photo

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
जयपुर। कृषि विधेयकों को रोकने के कारण राज्यपाल कलराज मिश्र इन दिनों कांग्रेस के निशाने पर हैं, लेकिन 13 साल पहले तत्कालीन राज्यपाल प्रतिभा पाटिल ने भी धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को एक साल रोक लिया था। पाटिल ने राज्यपाल पद छोडने से एक दिन पहले विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेज दिया था।

राज्यपालों के केन्द्र सरकार के इशारे पर काम करने को लेकर उच्चतम न्यायालय एतराज जताता रहा है। उच्चतम न्यायालय का तो यहां तक कहना है कि राज्यपालों को केन्द्र सरकार के एजेंट के बजाय स्वतंत्र रहकर अपना दायित्व पूरा करना चाहिए। इसके विपरीत तत्कालीन राज्यपाल प्रतिभा पाटिल ने केन्द्र में यूपीए सरकार के समय भाजपा सरकार द्वारा पारित धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को रोका और अब राज्यपाल कलराज मिश्र ने केन्द्र में भाजपा सरकार के रहते राज्य में कांग्रेस शासन द्वारा पारित कृषि विधेयकों को रोका है।

कृषि विधेयकों को मौजूदा राज्यपाल कलराज मिश्र ने करीब एक माह से रोक रखा है, जबकि तत्कालीन राज्यपाल प्रतिभा पाटिल ने धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को करीब एक साल तक रोके रखा था उन्होंने राज्यपाल पद छोडऩे से एक दिन पहले विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेज दिया था। राज्यपाल पद छोड़ने के बाद पाटिल ने राष्ट्रपति पद संभाला था। पुराना विधेयक लंबित रहते विधानसभा ने फिर से नया विधेयक पारित किया, लेकिन तत्कालीन राज्यपाल एस के सिंह ने नए सिरे से पारित विधेयक को भी राष्ट्रपति के पास भेज दिया था। वह विधेयक अब भी राष्ट्रपति के पास लंबित है और मौजूदा विधानसभा से करीब दो माह पहले पारित कृषि विधेयक राज्यपाल के फैसले के इंतजार में हैं।
राज्यपाल के पास चार रास्ते

संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत विधानसभा से पारित विधेयक को मंजूरी के लिए राज्यपाल के पास भेजा जाता है। राज्यपाल विधेयक को मंजूरी दे सकता है और उसे रोक भी सकता है। रोकने की समयावधि के लिए संविधान में कुछ नहीं कहा गया है। इसके अलावा राज्यपाल किसी विधेयक को मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भी भेज सकता है। सामान्य धारणा है कि राज्यपाल किसी विधेयक पर सरकार को पुनर्विचार के लिए भी कह सकता है।

'मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद विधानसभा से पारित विधेयक को क्यों रोका गया? राज्यपाल को विधेयक को मंजूरी देनी चाहिए या लौटाना चाहिए। राज्य सरकार ने अपने अधिकार क्षेत्र के विषय पर विधेयक पारित किया है और केन्द्र के विधेयकों को लेकर मामला उच्चतम न्यायालय में लंबित है। राज्यपालों को केन्द्र के इशारे पर काम नहीं करना चाहिए।'
— शिवकुमार शर्मा, पूर्व न्यायाधीश, राजस्थान उच्च न्यायालय