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बच्चा पैदा करने के लिए 15 दिन की पैराल, हाईकोर्ट के आदेश पर आपत्ति, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

पत्नी की गर्भधारण की चाह पर पति को पैरोल देने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, सरकार की दलील: खंडपीठ के आदेश के बाद ऐसी याचिकाओं की संख्या बढ़ी

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बच्चा पैदा करने के लिए 15 दिन की पैराल, हाईकोर्ट के आदेश पर आपत्ति, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

जयपुर /जोधपुर। पत्नी की गर्भधारण करने की गुहार पर अजमेर सेंट्रल जेल में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे बंदी को पंद्रह दिन की सशर्त पैरोल देने के राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। प्रधान न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ सरकार की विशेष अनुमति याचिका पर अगले सप्ताह सुनवाई करेगी।

राज्य सरकार शीर्ष अदालत में इस दलील के साथ पहुंची है कि नियमों में गर्भधारण के लिए पैरोल देने का कोई प्रावधान नहीं है। खंडपीठ के आदेश के बाद इस तरह की याचना वाली याचिकाओं की संख्या बढ़ रही है। हाल ही 21 जुलाई को एक याचिकाकर्ता अशोक ने एकलपीठ में इस आधार पर याचिका दायर की। इसकी सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि मामले में सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की गई है।


यह कहा था खंडपीठ ने

दरअसल, गत 5 अप्रेल को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एक विवाहिता की गर्भधारण चाह पर सजायाफ्ता पति को पैरोल पर छोड़ने की अनुमति दी थी। खंडपीठ ने कहा था कि एक विवाहित महिला के लिए नारीत्व पूरा करने को बच्चे को जन्म देना आवश्यक है। मां बनने पर उसका नारीत्व बढ़ जाता है। उसकी छवि गौरवान्वित होती है। परिवार के साथ-साथ समाज में भी उसका सम्मान होता है। खंडपीठ का मत था कि किसी भी महिला को पति के जेल रहने की दशा में ऐसी स्थिति में रहने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, जिसमें उसे बिना किसी गलती के अपने पति से कोई संतान न होने के कारण पीड़ित होना पड़े। खंडपीठ ने यह भी कहा था कि राजस्थान कैदी रिहाई पर पैरोल नियम, 2021 में कैदी को उसकी पत्नी के संतान होने के आधार पर पैरोल पर रिहा करने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, फिर भी धार्मिक दर्शन, सांस्कृतिक, सामाजिक और मानवीय पहलुओं पर विचार करते हुए, भारत के संविधान में गारंटीकृत मौलिक अधिकार के साथ कोर्ट याचिका को स्वीकार करता है।


याचिका मंजूरी के ये गिनाए कारण
खंडपीठ ने कहा था कि अगर मामले को धार्मिक पहलू से देखें तो हिंदू दर्शन के अनुसार, गर्भाधान 16 संस्कारों में से पहला है। यहूदी, ईसाई और कुछ अन्य अब्राहमिक धर्मों में जनन को ईश्वरीय आदेश कहा गया है। आदम और हव्वा को सांस्कृतिक जनादेश दिया गया था। इस्लामी शरीयत और इस्लाम में वंश के संरक्षण का कहा गया है। कोर्ट संतान के अधिकार और वंश के संरक्षण के समाजशास्त्रीय और संवैधानिक पहलू का विवेचन भी किया।