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राजस्थान का अनोखा गांव, जहां नहीं है एक भी मंदिर, धार्मिक कर्मकांड में नहीं लोगों का विश्वास

राजस्थान में एक ऐसा गांव भी है, जहां एक भी मंदिर भी नहीं है।  

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जयपुर

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Nidhi Mishra

May 29, 2018

rajasthan village

Rajasthan Village with No Temple - Weird Village of Rajasthan

जयपुर/चुरू। हमारे देश के कई भागों में अंधविश्वास की गहरी जड़ें जमी हैं। कुरीतियों ने इस कदर पैर पसार रखे हैं कि उन्हें पार पाना असंभव सा लगता है, लेकिन राजस्थान के चूरू जिले में एक अनोखा गांव है, जहां एक भी मंदिर नहीं है। इस गांव के लोग किसी धार्मिक कर्मकांड में विश्वास ही नहीं करते।


अस्थि प्रवाह का भी रिवाज नहीं

इस गांव में कोई मंदिर नहीं है। आश्चर्यजनक बात तो ये है कि यहां मृतकों की अस्थि प्रवाह जैसा भी कोई रिवाज नहीं है। यहां मरने वालों की अस्थियों को बहते पानी में प्रवाहित नहीं किया जाता। जी हां, हम बात कर रहे हैं चुरू जिले की तारानगर तहसील के गांव ‘लांबा की ढाणी’ के बारे में... यहां के लोग कर्म में विश्वास करते हैं। इसी के दम पर आज यहां के लोग शिक्षा, चिकित्सा, व्यापार के क्षेत्र में सफलता अर्जित कर चुके हैं और अपने गांव को देश भर में नई पहचान दे रहे हैं।

अपनी मेहनत पर विश्वास
लांबा की ढाणी के लोगों को अपनी मेहनत पर विश्वास है। ये लोग कर्मण्येवाधिकारस्तु मा फलेषु कदाचन पर विश्वास करते हुए सिर्फ अपने कर्मों को शुद्ध रखते हुए कार्य करते हैं। धार्मिक मान्यताओं को नहीं मानते हुए ये लोग अपनों के मरने पर उनकी अस्थियां भी गंगा जी में प्रवाहित नहीं करते। सबसे बड़ी बात तो ये है कि तकरीबन 105 घरों की आबादी वाले इस गांव में कोई मंदिर ही नहीं है। जबकि यहां लगभग 100 जाटों के घर, 5 घर नायकों और करीब 10 घर मेघवाल समाज के हैं।

यहां के लोगों ने राष्ट्रीय स्तर पर नाम किए रोशन
अपने कर्म के बूते और लगन के दम पर यहां के लोगों ने राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है। लाम्बा की ढाणी से करीब 25 से तीस युवक सेना में, इतने ही पुलिस में, 20 के आस पास रेलवे में और तकरीबन 25 से ज्यादा लोग चिकित्सा क्षेत्र में काम कर नाम कमा रहे हैं।इस ढाणी के पांच युवकों ने खेलों में राष्ट्रीय स्तर पर पदक भी प्राप्त किये हैं। वहीं दो युवक दो खेलों के कोच भी हैं।


65 साल पहले खत्म किया रिवाज

गांव के रहनेवाले 80 साल के एडवोकेट बीरबल सिंह लांबा ने बताया कि इस गांव में लगभग 65 साल पहले यहां रहने वाले लोगों ने सामूहिक रूप से तय किया कि गांव में किसी की मृत्यु पर उसका दाह संस्कार तो किया जाएगा, लेकिन अस्थियों का नदी में विर्सजन नहीं होगा। यहां दाह संस्कार के बाद बची हुई अस्थियों को ग्रामीण फिर से जला कर राख में बदल देते हैं।

कृषि प्रधान है गांव, शुरू से नहीं मंदिर में विश्वास
गांव पूरी तरह से कृषि प्रधान है। यहां के प्रधान ने बताया कि लोगों को मंदिर जैसी संस्था में शुरू से विश्वास नहीं था। वजह थी लोगों का सुबह से शाम तक मेहनत के काम में ही लगे रहना। बहरहाल यहां के लोग नास्तिक भी नहीं हैं, लेकिन धार्मिक अंधता जैसी चीज यहां दिखाई नहीं देती। मंदिर के नाम पर गांव के प्रधान कहते हैं कि ग्रामवासी कहा करते थे कि “मरण री फुरसत कोने, थे राम के नाम री बातां करो हो” (यहां मरने की भी फुरसत नहीं हैं और आप राम नाम की बात कर रहे हो)। गांव के एक अन्य निवासी और जिला खेल अधिकारी ईश्वर सिंह लांबा का कहना है कि गांव के लोग अंधविश्वास और आडम्बर से कोसों दूर है। इसी वजह से वे अपनी कोशिशों के बूते प्रशासनिक सेवा, वकालत, चिकित्सा, सेना, और खेलों में गांव का नाम रोशन कर रहे हैं।

दो लोग इंटेलीजेंस ब्यूरों में अधिकारी
आपको जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि गांव के दो लोग इंटेलीजेंस ब्यूरों में अधिकारी हैं। वहीं लगभग दो प्रोफेसर, 7 वकील, 35 अध्यापक, 30 पुलिस सेवा और 17 लोग रेलवे में हैं। स्वतंत्रता सेनानी पिता स्वर्गीय नारायण सिंह लांबा के पुत्र ईश्वर सिंह ने बताया कि उनके पिता ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी। द्वितीय विश्व युद्व और 1965 व 1971 के युद्धों में भी उन्होंने दुश्मनों से लोहा लिया था। हाल ही जनवरी में उनका 95 साल की आयु में निधन हो गया। उनके योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रपति ने भी सम्मानित किया था। सेना में लगातार 20 साल की सेवा के बाद उनको सेना मेडल से भी सम्मानित किया गया था.