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संपादकीय: दागी माननीयों को सम्मान न देने का सराहनीय कदम

किसी पुलिस अधिकारी को अपने खिलाफ आपराधिक प्रकरण की जांच के सिलसिले में उपस्थित हुए जनप्रतिनिधि को सेल्यूट करना पड़े तो इसे पुलिस का मनोबल कमजोर करने वाला ही कहा जाएगा।

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लोकतंत्र में दल कोई सा भी हो, जनप्रतिनिधि का महत्व होता है। वह इसलिए भी कि वह एक तरह से जनता का प्रतिनिधि है। जनप्रतिनिधि का सम्मान भी जनता का ही सम्मान है। इसीलिए निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के स्वागत को लेकर प्रोटोकॉल बनाए गए हैं। गाहे-बगाहे जनप्रतिनिधियों की ये शिकायतें भी सामने आती रहती हैं कि उन्हें अफसर प्रोटोकॉल के अनुरूप सम्मान नहीं देते। इसीलिए जो प्रोटोकॉल बनाए जाते हैं समय- समय पर इनकी अनुपालना के निर्देश भी सरकारी स्तर पर जारी होते रहते हैं। खास तौर पर यह लोकसेवकों को यह याद दिलाने के लिए कि उनको जनप्रतिनिधि के सम्मान में कैसा बर्ताव करना है। स्वागत-सम्मान के तमाम निर्देशों के बीच जनप्रतिनिधियों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे ईमानदार और स्वच्छ छवि वाले हों।

महाराष्ट्र सरकार के जनप्रतिनिधियों के प्रोटोकॉल में बदलाव का यह फैसला स्वागत योग्य है कि कोई जनप्रतिनिधि दागी और दोषी हैं तो अफसर उन्हें प्रोटोकॉल के अनुरूप सम्मान नहीं देंगे। यानी अफसरों को ऐसे माननीयों के सम्मान में खड़ेे होने या पुलिस सेल्यूट देने की आवश्यकता नहीं। हमारे देश में कानून सबके लिए बराबर है तो सजा का प्रावधान भी व्यक्ति के आधार पर भेद करने वाला नहीं है। जब कोई जनप्रतिनिधि जो किसी आपराधिक या अन्य मामले में दोषी हो अथवा किसी जांच, अपील व सुनवाई के लिए पक्षकार के रूप में किसी सरकारी अधिकारी के सम्मुख आ रहा हो तो उसके सम्मान में खड़े होने का प्रोटोकॉल सचमुच संबंधित अधिकारी के लिए ऊहापोह भरा हो जाता है। किसी पुलिस अधिकारी को अपने खिलाफ आपराधिक प्रकरण की जांच के सिलसिले में उपस्थित हुए जनप्रतिनिधि को सेल्यूट करना पड़े तो इसे पुलिस का मनोबल कमजोर करने वाला ही कहा जाएगा। ऐसे में यह जरूरी है कि दागी माननीयों के मामले में उनसे संबंधित अधिकारी सामान्य नागरिक की तरह ही व्यवहार करे।

चुनाव संबंधी प्रक्रियाओं के दौरान भी इसी तरह के व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। दागी माननीयों को वैसे तो नैतिकता के आधार पर ही ऐसा सम्मान ग्रहण करने की आकांक्षा नहीं रखनी चाहिए। लोकतंत्र में दागी उम्मीदवार जनप्रतिनिधि नहीं बन पाएं इसके लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में प्रावधान तो किए गए हैं लेकिन इनमें भी पर्याप्त सुधार की जरूरत है। यह भी देखने में आता है कि कई बार निर्वाचित होने के बाद जनप्रतिनिधियों के खिलाफ हत्या व बलात्कार जैसे संगीन मामले दर्ज हो जाते हैं। हो सकता है कि जांच प्रक्रिया में वे निर्दोष भी साबित हो जाएं लेकिन जब तक कानून की नजर में वे दागदार श्रेणी में आते हैं उन्हें नौकरशाही से सम्मान की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए।सवाल सिर्फ महाराष्ट्र का ही नहीं, समूचे देश में जनप्रतिनिधियों के प्रोटोकॉल में ऐसा प्रावधान अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए जो महाराष्ट्र सरकार ने किया है। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की भूमिका चुनाव जीतने तक ही सीमित नहीं है बल्कि खुद की छवि स्वच्छ बनाए रखने का उनका अहम दायित्व भी है।