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ढाबे की दीवार पेंट कर खाने का बिल भर दिया करता था ये आर्टिस्ट

एमएफ हुसैन की फिल्म से प्रभावित होकर राजस्थान को बनाया कर्मस्थली
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जयपुर

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Priyanka Yadav

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Updated: 23 Apr 2018, 12:44 PM IST

senior artist

जयपुर . मालवीय नगर के मॉडलटाउन में रहने वाले सुरेन्द्र पाल जोशी प्रदेश के वरिष्ठ चित्रकार है । कुछ समय से वे बीमारी के चलते जरूर कमजोर हो गए हैं, लेकिन उनका कला के प्रति प्रेम बिलकुल भी कम नहीं हुआ। उनके पास अनिश कपूर की एग्जीबिशन का कैटलॉग रखा हुआ था, जिसे वे बड़े आत्मीयता के साथ देख रहे थे। हमारी बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ और उन्होंने सबसे पहले हालही में बनाई कुछ ड्रॉइंग दिखाने के साथ अपने स्टूडियो में रखी कलाकृतियों से रूबरू करवाया। पेश से है, सुरेन्द्र पाल से हुई बातचीत की कहानी उन्हीं की जुबानी।

सरकारी नौकरी के नाम पर मां से परमिशन

ऋषिकेश में पढ़ाई के दौरान कवि, लेखकों से दोस्ती हो गई थी और उनके ड्रॉइंग बनाया करता था। फिर रामलीलाओं के पर्दे बनाने लगा, यह मेरा पार्ट टाइम जॉब था, जिसे मैं रात को सभी के सो जाने के बाद किया करता था। मेरे काम को देखकर दोस्त फाइन आर्ट में पढ़ाई करने को कहते थे, लेकिन तब तक मुझे फाइन आर्ट जैसे विषय की नॉलेज तक नहीं थी। घर में पांच बहनें और मां थी। वे मेरी सरकारी नौकरी के ही सपना देखा करते थे। दोस्तों की सलाह पर लखनऊ कॉलेज ऑफ आर्ट में जाने का निर्णय लिया और इसमें सरकारी नौकरी की संभावनाएं बताकर मां से पढ़ाई की परमिशन भी ली। कभी भी फस्र्ट नहीं रहने वाले स्टूडेंट ने लखनऊ कॉलेज के स्कॉलरशिप टेस्ट में टॉप किया और स्कॉलरशिप प्राप्त की।

150 रुपए भेजा करती थी मां

लखनऊ में जीवनयापन के लिए मां १५० रुपए भेजा करती थी, जो बहुत जल्द खर्च हो जाया करतो थे। देर रात तक रेलवे स्टेशन पर ड्राइंग बनाता था और घर लौटते वक्त ढाबा पर खाना खाता था। एक बार पैसे खत्म हो गए और खाना खाने के बाद ढाबा मालिक ने पैसे मांगे। फिर मैंने ढाबे की दीवार पर वहां के मालिक का पोट्रेट बना दिया, जिससे सभी खुश हो गए और पैसे माफ कर दिए। एेसा दो बार और हुआ, जिसके बाद ढाबा मालिक ने कहा कि जब भी तुम्हारे पास पैसे आए तब लौटा देना, क्योंकि पैसों से ही यहां कई लोगों का घर चलता है।

विख्यात कलाकृतियां और अवॉर्ड

- स्टील फेसिंग और एक लाख सेफ्टीपिन से बनाया हैलीकॉप्टर
- स्टील फेसिंग और ७० हजार सेफ्टीपिन से बना हैलमेट
- राजीव गांधी एक्सीलेंसी अवॉर्ड
- सेफ्टीपिन के बने दमाउ-ढोल की कलाकृतियां
- यूनेस्को से एशियन कल्चर अवॉर्ड
- यूनेस्को से गोल्ड मेडल


उत्तराखंड की त्रासदी को लेकर कई कलाकृतियों को तैयार किया था, जो उस त्रासदी को बयां करने के साथ सेना को सेल्यूट करती प्रतीत होती थी। इन कलाकृतियों के साथ मेरी कला यात्रा की बताने के लिए उत्तराखंड सरकार ने मेरे नाम से म्यूजियम बनाया है, जो मेरे लिए गौरव की बात है। एक नामचीन आर्टिस्ट्स ने तो यहां तक कहा कि लोगों के मरने के बाद भी म्यूजियम नसीब नहीं होते और आपके जीवत रहते हुए इतना बड़ा म्यूजियम बनना बड़ी उपलब्धि है।

पहली फुटपाथ एग्जीबिशन

कॉलेज में पढ़ाई के दौरान एग्जीबिशन लगाने का प्लान किया और इसके लिए बहुत से आर्टवर्क को फ्रेम भी करवाया। स्टूडेंट होने के चलते एग्जीबिशन के लिए वैन्यू नहीं मिला, ललित कला अकादमी में भी अभी सीखने की बात कहकर निकाल दिया। बचपन से जिद्दी तो था ही, खुद ही एग्जीबिशन की तैयारियों मंे जुट गया। चर्च की दीवार, सडक़ के फुटपाथ पर पेंटिंग्स को डिस्प्ले किया। इसके बाद इस फुटपाथ एग्जीबिशन की चर्चा पूरे लखनऊ में थी और जिन लोगों ने मेरे हाथ के बनाए इन्विटेशन कार्ड को फाड़ दिया था, वे ही मुझे अब प्रोत्साहित कर रहे थे।