
Banaskantha : ६१ टीमें कर रही टिड्डियों को नियंत्रण में लेने का प्रयास
जयपुर
प्रदेश में मुसीबत बने टिड्डियों के दल और सर्दी से किसानों की कमर टूट गई हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक संसाधन कम होने से टिड्डियां इस समय किसानों पर हावी हो रही हैं। वहीं टिड्डियों की पहली पसंद भी रेगिस्तान को माना गया है। क्योकि रेगिस्तानी क्षेत्र इनके प्रजनन कर संख्या बढ़ाने के लिए काफी अनुकूल होता है। यही कारण है कि राजस्थान के रेगिस्तानी जिलों में सबसे ज्यादा टिड्डियां कहर बरपा रही हैं। राजस्थान में थार रेगिस्तान का विशाल बंजर भूभाग शामिल है। जो पश्चिम में पाकिस्तान की सीमा तक सतलुज-सिंधु नदी घाटी तक फैला हुआ है। राजस्थान की सीमाएं दक्षिण-पश्चिम में गुजरात उत्तर-पूर्व में हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश तथा उत्तर में पंजाब से लगती हैं। इसलिए यह क्षेत्र पाकिस्तानी टिड्डियों के हमले से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। वहीं टिड्डियों को पनपने के लिए रेतीला क्षेत्र काफी अनुकूल है। माना जाता है कि एक मादा टिड्डी 108 अंडे देती है। ऐसे में इन पर नियंत्रण मुश्किल होता हैं। हालांकि टिड्डियों को असर राजस्थान के अलावा गुजरात और हरियाणा के किसान भी झेल रहे हैं।
एक छोटा झुंड 35,000 लोगों जितना खाता है खाना
मादा टिड्डी एक साथ अंडे देती हैं। जिससे इनके समूह बनते जाते हैं। छोटे छोटे समूहों में टिड्डियां हमला करती हैं। टिड्डी एक समूह में हजारों की संख्या में होती हैं। कृषि विशेषज्ञ बताते है कि एक हैक्टेयर में एक से 8 करोड़ तक की संख्या में टिड्डी के समूह की उपस्थिति होती है। जिससे किसानों को भारी नुकसान होता हैं। क्योकि एक टिड्डी अपने वजन के बराबर वनस्पति हर रोज चट कर जाती है। खेतों में उगी फसल में को नष्ट करने के लिए टिड्डियों का एक छोटा दल एक दिन में 150 किमी तक हवा के साथ उड़ सकता हैं। इनका एक छोटा दल एक दिन में लगभग 35,000 लोगों जितना खाना खाता है। इनका प्रमुख भोजन खेतों में खड़ी फसल हैं। यही कारण है कि राजस्थान के जैसलमेर, बाडमेर, जालौर, बीकानेर, जोधपुर के खेतों में टिड्डियों ने सरसों, आलू, गेहूं और सौंफ, जीरा, कपास सहित रबी की फसलों को चट कर दिया हैं।
प्रजनन के बाद वयस्क हुई टिड्डियों का हमला
टिड्डी प्रजनन का मौसम जून-जुलाई से अक्टूबर-नवंबर तक होता है। इस मौसम में प्रजनन के बाद अंडों से निकले बच्चें अब वयस्क चुके हैं। इनकी संख्या पाकिस्तान के बलुचिस्तान के रेगिस्तान में सबसे ज्यादा बढ़ती हैं। इस समय हवा का रुख भारत की ओर होने से यह उस हवा के साथ यह भारत में प्रवेश कर जाती हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अब कीटनाशक से ही इन्हें खत्म किया जा रहा हैं। वहीं द ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी गोडावन भी इनका इलाज हैं। क्योकि गोडावन टिड्डी का भोजन करते हैं। लेकिन रेगिस्तान में कम होती गोडावन की संख्या के कारण टिड्डी फसलों को चट कर रही हैं।
Published on:
31 Dec 2019 09:09 am
