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JLF 2026: हिमालय केवल पर्वत नहीं, संस्कृति-इतिहास और आध्यात्म की जीवित परंपरा

दार्जिलिंग केवल एक खूबसूरत हिल स्टेशन नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक और ऐतिहासिक केंद्र रहा है। दार्जिलिंग में कई महान लोगों ने अंतिम सांस ली है। 1910 में तिब्बत छोड़ने के बाद दलाई लामा का दार्जिलिंग में प्रवास इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है।

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जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सत्र रोएरिच: हिमालयन विस्तास में हिमालय को केवल प्राकृतिक सौंदर्य नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और आध्यात्म की जीवित परंपरा के रूप में देखने पर जोर दिया गया।

सत्र के वक्ता रूसी विद्वान व्लादिमीर जाइत्सेव और लेखक-पर्यावरणविद स्टीफन ऑल्टर ने प्रसिद्ध कलाकार और दार्शनिक निकोलस रोएरिच के जीवन, यात्राओं और कृतियों के माध्यम से हिमालय की बहुआयामी तस्वीर सामने रखी।

व्लादिमीर जाइत्सेव ने कहा कि दार्जिलिंग केवल एक खूबसूरत हिल स्टेशन नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक और ऐतिहासिक केंद्र रहा है। दार्जिलिंग में कई महान लोगों ने अंतिम सांस ली है। उन्होंने बताया कि संस्कृत के प्रमुख विद्वान डॉ. शेवात्स्की भी यहां ठहरे, वहीं 1910 में तिब्बत छोड़ने के बाद दलाई लामा का दार्जिलिंग में प्रवास इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है। सत्र में दार्जिलिंग को महान पर्वतारोहियों और शेरपाओं की धरती बताते हुए तेनजिंग नोर्गे जैसे नामों का उल्लेख किया गया।

रोएरिच की प्रसिद्ध पेंटिंग ‘एक्स्टेसी’ और उनके लेखन का जिक्र करते हुए कहा गया कि उनके लिए हिमालय केवल दृश्य सौंदर्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभव था। रोएरिच ने लिखा है कि हिमालय में सभी धर्म और शिक्षाएं एक हो जाती हैं

वक्ताओं ने रोएरिच की ट्रांस-हिमालयन यात्रा का भी उल्लेख किया, जो लद्दाख से लेकर चीन, मंगोलिया, तिब्बत और साइबेरिया तक फैली। इस अभियान में 35 से अधिक पर्वतीय दर्रे पार किए गए और एकत्र सामग्री अमेरिका भेजी गई। सत्र में कहा गया कि रोएरिच की कला और यात्राएं आज भी हिमालय को समझने की नई दृष्टि देती हैं।

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