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मरीज को दवा पकड़ाई ब्रांडेड कीमत पर, जेनरिक मांगी तो दवा के वही पत्ते थमाए आधी कीमत में

जेनेरिक स्टोर पर भी "ब्रांडेड जेनरिक" का खेल...सरकार की आंखों के सामने मरीजों की जेब पर अटैक। ब्रांडेड दवा के नाम पर दोगुनी या कई गुना कीमत चुकाने से बचने के लिए मरीज अब जेनेरिक दवा स्टोर का रूख करने लगे हैं। जेनेरिक मेडिकल स्टोर पर भी रहें अलर्ट, नहीं तो चुकानी पड़ सकती है ब्रांडेड कीमत

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जयपुर

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VIKAS JAIN

Sep 20, 2023

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जयपुर। ब्रांडेड दवा के नाम पर दोगुनी या कई गुना कीमत चुकाने से बचने के लिए मरीज अब जेनेरिक दवा स्टोर का रूख करने लगे हैं। लेकिन इन दुकानों पर भी आप सजग नहीं रहे तो आपको ब्रांडेड के तौर पर ही कई गुना कीमत चुकानी पड़ सकती है। सस्ती दवाइयों के लिए अब राजधानी के करीब-करीब हर इलाके में जेनेरिक मेडिकल स्टोर उपलब्ध हैं। लेकिन यहां भी दवा को ब्रांडेड और जेनेरिक दोनों ही कीमतों पर बेचा जा रहा है। यानि, मरीज ने खुद जेनेरिक मांगी तो ही उसे जेनेरिक कीमत पर दवा दी जाती है, वरना इन स्टोर भी कई बार ब्रांडेड जितने ही दाम वसूल किए जा रहे हैं। दरअसल, अभी भी देश में आवश्यक दवा सूची में शामिल 870 दवाइयों में से करीब 35 प्रतिशत दवाइयां मूल्य नियंत्रण के दायरे में नहीं है।

पहले 490 में ब्रांडेड कीमत से, जेनरिक मांगी तो वही 250 रुपए में

बीपी की नियमित दवा लेने वाले एक मरीज ने एक जेनेरिक स्टोर से 10-10 गोली वाली दवा के तीन पत्ते खरीदे। फार्मासिस्ट ने 20 प्रतिशत डिस्काउंट बताकर उसकी कीमत 490 रुपए वसूल ली। जेनेरिक स्टोर से भी इतनी महंगी दवा पर उसने पूछताछ कर जेनरिक दवा मांगी तो फार्मासिस्ट ने तत्काल 240 रुपए वापस लौटाते हुए दवा के वही तीन पत्ते मरीज को दे दिए। यानि, जिस दवा के ब्रांडेड के तौर पर दोगुने दाम लिए गए, वही जेनेरिक के तौर पर आधी कीमत में दे दी गई।

टॉपिक एक्सपर्ट : कुछ कंपनियां ब्रांडेड और जेनेरिक दोनों बना रही, इसलिए पहचानना मुश्किल

डॉ.शुभकाम आर्य, ईएनटी विशेषज्ञ

कुछ कंपनियां, ब्रांडेड व जेनेरिक दोनों बनाती हैं। इसलिए ये केमिस्ट पर ही निर्भर करता है कि वो मरीज़ को किस कंपनी की दवा दें। ज़्यादातर जेनेरिक पर अंकित रेट वास्तविक रेट से कई गुना होती है। कुछ जेनेरिक दवा भी अपने ब्रांड नाम से आती हैं। इसलिए इन्हें महज़ देखकर यह अंतर नहीं किया जा सकता कि कौनसी जेनेरिक है और कौनसी ब्रांडेड। इससे मरीजों में भ्रम होता है और कई बार उनसे जेनेरिक के भी ब्रांडेड जितने दाम वसूल लिए जाते हैं। मरीज़ों को स्वास्थ्य पर खर्च में कमी लाने के लिए सरकारी स्तर पर डॉक्टर्स को जेनेरिक दवा लिखने के लिए कहा जाता है। दूसरी तरफ़ सरकार ने ही इन पर एमआरपी को वास्तविक मूल्य की तुलना में कई गुना अंकित करने की इजाज़त दे रखी है। इसके चलते ज़्यादातर मरीज़ों को इसका वास्तविक फ़ायदा नहीं मिल पाता।

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जेनेरिक और ब्रांडेड को अलग-अलग परिभा षित ही नहीं किया गया है। कंपनियां अ धिकतम कीमत अंकित कर दवाइयां बाजार में ले आती हैं। अब वह उस कीमत से अ धिक कीमत पर बेचती है तो ही वह अवहेलना माना जाता है। वह जेनेरिक बताकर उसे कितनी भी कम कीमत पर बेच देता है तो वह केमिस्ट की उदारता बन जाता है।
अजय फाटक, औष धि नियंत्रक