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महंगाई में भडक़ी माचिस...कीमत दोगुनी, 1 दिसंबर से 2 रुपए में मिलेगी

100 साल में 200 गुना बढ़ी माचिस की कीमत, पैसे होने के बाद भी नहीं मिल रहा कच्चा माल

जयपुर

Updated: November 02, 2021 01:38:00 am

मोहित शर्मा
जयपुर. रोजमर्रा के काम आने वाली माचिस पर भी महंगाई की चपेट में है। अब 1 दिसंबर से 1 रुपए की माचिस 2 रुपए में मिलेगी। भारत में सन् 1927 में शिवाकाशी में नाडाल बंधुओं ने माचिस का उत्पादन शुरू किया था। इससे पहले तक भारत विदेशी कंपनियों पर निर्भर था।
राजस्थान में माचिस के संग्रहकर्ता वल्र्ड रिकॉर्ड होल्डर महेश जैन ने बताया कि 14 वर्षों में माचिस का मूल्य स्थिर रहा। अब पेट्रोल डीजल एवं कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण 1 दिसंबर से माचिस 1 की जगह 2 रुपए की हो जाएगी। इससे पहले 2007 में माचिस के दाम 50 पैसे बढ़ाकर से 1 रुपया किया गया। महेश के पास देश विदेश कि 50 हजार से अधिक माचिसों का संग्रह है।
 माचिस 1 दिसंबर से 2 रुपए में मिलेगी
माचिस 1 दिसंबर से 2 रुपए में मिलेगी
कैसे शुरू हुई माचिस की दुनिया
माचिस का आविष्कार 31 दिसंबर 1827 में ब्रिटिश वैज्ञानिक जॉन वॉकर ने किया था। उन्होंने ऐसी माचिस की तिली बनाई जिसे किसी भी खुरदरी जगह पर रगडऩे से जल जाती थी। वर्ष 1832 फ्रांस में एंटीमनी सल्फाइड की जगह फास्फोरस का इस्तेमाल किया गया जिससे धुआं विषैला होता था। इसके बाद वर्ष 1855 में स्वीडन मैं दूसरे रासायनिक पदार्थों के मिश्रण का इस्तेमाल कर सुरक्षित माचिस बनाई जिसका आज तक इस्तेमाल किया जा रहा है।
तिली के लिए लकड़ी का उपयोग
माचिस की तिली कई प्रकार की लकड़ी से बनाई जाती है, जिसमें अफ्रीकन ब्लैक बोर्ड लकड़ी का भी इस्तेमाल होता है। पॉप्लर नाम के पेड़ की लकड़ी भी तिली बनाने के लिए अच्छी मानी जाती है। माचिस का मुख्य उत्पादन तमिलनाडु में होता है।
ऐसे बढ़ती रही कीमत
आजादी से पूर्व देश में माचिस एक पैसे में मिलती थी। उसके बाद 2—3 पैसे की माचिस चली, एक आना में भी माचिस आती थी। 1950 में माचिस का मूल्य 5 पैसे हुआ। 50 से 60 के दशक तक 6 पैसे, 8 पैसे हुई। इसके बाद वर्ष 1960 में 10 पैसे हुई। 60 से 70 के दशक में 13 पैसे की हुई। वर्ष 1970 में 15 पैसे, 20 पैसे, 1973 में 25 पैसे, 1994 में 50 पैसा की हुई। इसके बाद 2007 में माचिस का मूल्य 1 रुपया हुआ। अब यह १ दिसम्बर से २ रुपए में मिलेगी। करीब १०० साल में मासिच की कीमत २०० गुना तक बढ़ गई है।
वक्त के साथ बदले तेवर
वर्ष 1975 तक लकड़ी की तिली वाली माचिसों का उपयोग होता था। उसके बाद लकड़ी की जगह कार्ड बोर्ड ने ले ली। फिर वैक्स की तिलियों वाली माचिस भी बन गई, जो साइज में अत्यंत छोटी होती है। वक्त के साथ जो चीजें ट्रेंड में रहीं माचिस पर उनकी तस्वीर भी आती जाती रही।
महंगाई की मार का असर
पांच प्रमुख मैचबॉक्स इंडस्ट्रीज बॉडी के रिप्रेजेंटेटिव ने हाल ही में शिवकाशी में मीटिंग की थी जिसमें माचिस की एमआरपी बढ़ाने का फैसला किया गया। मैन्युफैक्चरर्स ने बताया कि माचिस बनाने के लिए 14 तरह के कच्चे माल का उपयोग किया जाता है। इनकी कीमतें बढऩे के साथ ही फ्यूल की कीमतों में भी बढ़ोतरी ने ट्रांसपोर्ट की लागत को बढ़ा दिया है। इसलिए माचिस की कीमत बढ़ानी पड़ी।
हर कच्चा माल दोगुना महंगा
माचिस बनाने में लगने वाले हर कच्चे माल की कीमत दोगुनी हो गई है। माचिस बोर्ड, उस पर होने वाला प्रिंट तथा तिली में लगने वाला ग्लोराइड सबकी कीमत डबल हो गई है। पैसा होने के बाद भी कच्चा माल नहीं मिल रहा है। चीन से कच्चा माल बंद होने के बाद यह दिक्कत हुई है।
- मथुरादास शर्मा, कारोबारी, शिवकाशी, तमिलनाडु

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