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जया गुप्ता/जयपुर. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव वैश्विक स्तर के साथ-साथ राज्य पर भी बड़े स्तर पर दिखाई दे रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण राज्य में मौसम चक्र में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। इस साल यह असर अपेक्षाकृत अधिक दिखाई दिया। पहले शीतलहर से प्रदेश ठिठुरा फिर भीषण लू की चपेट में रहा और मानसून सीजन में भारी बारिश के कारण बाढ की स्थिति से लोगों को दो-चार होना पड़ा। तेजी से बदल रहे मौसम चक्र को लेकर पर्यावरणविद् चिंतित हैं जबकि सरकार बिल्कुल बेफ्रिक है। जलवायु परिवर्तन के कारण उपज रही स्थितियों से निपटने के लिए राज्य सरकार की ओर से कोई कार्य नहीं किए जा रहे हैं।
राज्य में इस साल मौसम चक्र में यों दिखा परिवर्तन :
- शीतलहर - जनवरी 2022 में 31 में से 18 दिन तक शीतलहर चली। शीतलहर के साथ-साथ सात दिन तक बारिश-ओलावृष्टि रही।
- भीषण लू - अप्रेल 2022 पिछले 122 साल में सर्वाधिक गर्म रहा है। पूरे सीजन में 51 दिन लू चली जबकि पिछले एक दशक की बात करें तो राजस्थान में औसतन 8-10 दिन ही लू चली है। मौसम विभाग अप्रेल से जून तक ही गर्मी का सीजन मानता है। इस बार प्रदेश में 15 मार्च से लू चलना शुरू हो गई थी।
- भारी बारिश के दिन अधिक - इस साल मानसून सीजन के कुल 122 दिन में 61 दिन सामान्य से अधिक बारिश हुई। पश्चिमी व उत्तरी राजस्थान के कई जिलों में औसत से दोगुनी बारिश हुई। एक दिन में 100 से 250 मिमी तक बारिश हुई। जबकि साल 2021 में मानसून के दौरान 58 दिन सामान्य से अधिक बारिश हुई थी, वहीं साल 2020 में 45 दिन अधिक बारिश हुई थी।
मुख्यत: चार प्रकार से दिख रहा जलवायु परिवर्तन का असर
1. तापमान में बढ़ोतरी : रात के तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। रात का तापमान औसत से अधिक दर्ज किया जा रहा है। वहीं ऐसे दिनों की संख्या बढ़ रही है, जिनमें अधिकतम तापमान अधिक दर्ज किया जा रहा है। भीषण लू और शीतलहर अधिक चल रही है। यह असर यूएस, यूके सहित अन्य कई देशों में देखने को मिल रहा है।
2. आधिक बारिश : जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़, सूखा और पानी की उपलब्Iता प्रभावित हो रही है। सीजन की औसत में बदलाव नहीं हो रहा है बल्कि पूरे सीजन की बारिश कम दिनों में हो रही है। उदारहण के तौर पर पहले जहां सीजन की औसत बारिश 40 दिन में होती थी, अब कई जिलों 15-20 में ही हो रही है। इस बार श्रीगंगानगर में पूरे सीजन की बारिश 3-4 दिन में हो गई थी।
3. सीजनल शिफ्ट : मौसम चक्र में बड़ा परिवर्तन सीजनल शिफ्ट में देखने को मिल रहा है। अभी तक मौसम विभाग जून से सितम्बर तक बारिश का सीजन मानता है। अब जून में भीषण गर्मी पड़ रही है और अक्टूबर में बारिश हो रही है। वहीं पश्चिमी राजस्थान में बारिश बढ़ रही है। पहले पश्चिमी राजस्थान औसतन 150 मिमी बारिश होती थी, अब 200-250 मिमी तक औसतन बारिश हो रही है।
4. सूखा की स्थिति अधिक : कोटा संभाग के जिलों में पिछले दो-तीन वर्षों से हर साल बाढ़ की स्थिति बन रही है। इसी प्रकार 9-10 जिले सूखे को झेल रहे हैं। हर साल किसी न किसी जिले में सूखा पड़ रहा है।
मौसम चक्र बदलने का असर हम पर
- फसल खराब - हर सीजन में फसलें खराब हो रही हैं। इसका सीधा असर खाद्यान्न आपूर्ति पर पड़ेगा।
- गिरता भूजल स्तर - एक ही दिन में अधिक बारिश होने से पानी जमीन के भीतर समाहित नहीं हो पाता और नालों में बह जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि अत्यधिक बारिश के स्थान पर पूरे सीजन में बारिश हो तो पानी व्यर्थ न बहे तो भूजल स्तर बढ़ सकता है।
- मौसमी बीमारियों का खतरा - डेगूं, चिकनगुनिया सहित अन्य मौसमी बीमारियों का समय बढ़ गया है।
- रोजगार पर संकट - बाढ़, सूखा पड़ने व फसलें खराब होने से रोजगार पर भी संकट बढ़ रहा है।
फैक्ट फाइल :
साल 2021 में बाढ़, सूखा व ओलवृष्टि के कारण यों प्रभावित हुए किसान
बाढ़
प्रभावित जिले - 9
प्रभावित किसान - 7,21,103
सरकारी सहायता - 4,28,46,75,482 (रुपए में)
सूखा
प्रभावित - 10 जिले
किसान - 11,57,008
सरकारी सहायता - 9,83,78,64,099 (रुपए में)
ओलावृष्टि :
जिले : 5
किसान : 21,204
सरकारी सहायता : 19,28,28,489 (रुपए में)
एक्सपर्ट कमेंट :
- जलवायु परिवर्तन का कारण वैश्चिक भी है और स्थानीय भी। शहरी क्षेत्र में असर अधिक दिखाई दे रहा है। यहां तापमान तेजी से बढ़ रहा है। शहरी क्षेत्र में ठोस सतह (सीमेंट-क्रंक्रीट) अधिक है। यह सतह दिन में रेडिएशन को अपने भीतर ग्रहण कर लेती है और सूर्यास्त के बाद छोड़ती है। इसी कारण रात का तापमान बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया बहुत धीमी है और इससे निपटने के लिए हमें एडॉप्टेशन के रास्ते पर जाना होगा। लोग अपने स्तर पर भी कुछ आदतों में बदलाव करें और सरकार भी छोटे-छोटे प्रयास करे। उदारहण के तौर पर शहरी क्षेत्र में हरियाली बढ़ाई जाएगी। नए जलाशय तैयार किए जाए। काले रंग की सतह अधिक रेडिएशन सोखती है, उसका रंग बदला जाए। रूफ टॉप को हरा-भरा किया जाए। फुटपाथ पर सीमेंट की टाइल लगाई जाती है, उसके बीच-बीच में घास लगाई जाए। ऐसे छोटे-छोटे प्रयासों से हम कुछ बदलाव ला सकेंगे।
- प्रो. महेश कुमार जाट, एमएनआइटी व पर्यावरणविद्
Published on:
07 Nov 2022 12:34 pm
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