
आनुवंशिक डेटा के आधार पर तब के इंसानी जीवन और उनके मूवमेंट का पता लगाया गया।
नई दिल्ली. इंसानों के विकास क्रम पर एक अध्ययन में सामने आया है कि दक्षिण अफ्रीका में करीब 9 लाख वर्ष पहले इंसानों के पूर्वज लगभग विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गए थे। साइंस मैगजीन में प्रकाशित इस अध्ययन में सामने आया कि प्रजनन योग्य इंसानों की संख्या घटकर 1280 रह गई थी और अगले एक लाख 17 हजार वर्षों तक इसमें कोई विस्तार नहीं हुआ। अध्ययन करने वालों में चीन के आनुवांशिकीविद हैपेंग ली कहते हैं, उस कालखंड में लगभग 98.7 फीसदी मानव पूर्वज खत्म हो गए थे। उनका कहना है, अफ्रीका और यूरेशिया में 9 लाख 50 हजार से 6 लाख 50 हजार वर्ष पहले के जीवाश्म रिकॉर्ड से इस कालानुक्रम का पता चलता है। लंदन में ब्रिटिश संग्रहालय के पुरातत्त्वविद निक एश्टन का कहना है कि तब इतनी कम आबादी चकित करने वाली है। इलिनाय विश्वविद्यालय के मानवविज्ञानी स्टेनली एंब्रोस कहते हैं, तकनीक के जरिए 8 से 10 लाख वर्ष पहले की अवधि का विश्लेषण किया गया। इस तरह का यह पहला अध्ययन है।
क्यों आई ऐसी नौबत
यह अवधि प्रारंभिक-मध्य प्लेइस्टोसिन काल का हिस्सा थी। ये कठोर जलवायु परिवर्तन का समय था, जब ग्लेशियर्स चक्र ज्यादा लंबा और तेज हो गया था। इसके चलते अफ्रीका और अमरीका में लंबे समय तक सूखा पड़ा। ली ने बताया, बदलती जलवायु ने मानव पूर्वजों को खत्म कर दिया होगा और नई प्रजातियों की उत्पत्ति के लिए मजबूर किया होगा। आखिरकार ये संभवत: आधुनिक इंसानों और इनके विलुप्त पूर्वजों के अंतिम सामान्य पूर्वज डेनिवसोवन्स और निएंडरथल के रूप में विकसित हुए होंगे।
एक लाख 17 हजार वर्ष पहले फिर बढऩे लगी आबादी
लगभग एक लाख 17 हजार वर्ष पूर्व (813,000 वर्ष पूर्व) इंसानों की आबादी फिर बढऩे लगी। शेडोंग फस्र्ट मेडिकल यूनिवर्सिटी और जिनान शेडोंगे एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज के जनसंख्या आनुवांशिकीविद जिकियन हाओ कहते हैं, तब हमारे पूर्वज कैसे जिंदा रहे और किस तरह वे फिर पनपे, यह जानकारी स्पष्ट नहीं है। हालांकि जो भी वजह थी, उसका मानव की आनुवंशिक विविधता पर महत्वपूर्ण असर पड़ा है। इसमें मस्तिष्क के आकार में बदलाव भी है। हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन अफ्रीका के बाहर की परिस्थितियों को लेकर कोई दावा नहीं करता।
आनुवांशिक डेटा से किया अध्ययन
हम अब भी कई कारणों से प्रारंभिक मानव पूर्वजों की आबादी और गतिशीलता के बारे में बहुत कम जानते हैं। इस मुश्किल को हल करने के लिए शोधकर्ताओं ने नई पद्धति विकसित की, जो उन्हें मानव पूर्वजों के बारे में जानकारी जुटाने में मददगार साबित हुई। इसमें मौजूदा इंसानों के आनुवंशिक डेटा के आधार पर तब के इंसानी जीवन और उनके मूवमेंट का पता लगाया गया।
सेरेना टुकी, मानवविज्ञानी
(येल यूनिवर्सिटी, कनेक्टिकट)
Published on:
02 Sept 2023 11:27 pm
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