राजस्थान में चुनावी माहौल गरमा रहा है। नेता चुनावी तैयारियों में जुटे हैं। एक और टिकटों को लेकर घमासान चल रहा है वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे भी नेता है जो अपनी टिकट तय मान कर मनमानी सीट चाहते हैं। जी हां, एक और टिकट की जंग तो दूसरी ओर सीट बदलने की तलब..लोकतंत्र का ये अंदाज भी देखिए जहां नेता-नेता के बीच में, और कहीं नेता और कार्यकर्ता के बीच में, अपनी-अपनी अलग जंग है, अलग ख्वाहिशें है। चलिए आज इसी मुद्दे को जरा टटोलते हैं कि एक बार जहां से चुनाव लड़े, अगली बार वहां के बजाए कहीं ओर से चुनाव क्यों लड़ना चाहते हैं नेताजी। राजस्थान में दोनों ही पार्टियों में कुछ नेता ऐसे हैं जो इस बार सियासी पारी नई जगह से शुरू करना चाहते है।
दरअसल, ये भी स्पष्ट करना जरूरी है कि सीट बदलना राजनीति का व्यवहारिक पक्ष है। लेकिन चुनिंदा नेता या चुनिंदा मौक़े हों तो अलग बात है, ये चलन बढ़ने लगा है। आम लोगों को अक्सर ये शिकायत रहती है कि हार के बाद कोई विधानसभा क्षेत्र में दिखता नहीं और किसी की जीत के बाद काम होते नहीं। अगर नेताओं की सीट बदलने की मंशा के पीछे यही कारण है, तो आपत्ति उठनी चाहिए।