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क्यों गिरे चने के दाम, क्यों भटक रहे किसान

प्रधानमंत्री अन्नदाता आय सरंक्षण अभियान से नहीं मिल रहा सरंक्षण आंदोलन करने पर मजबूर हो रहे किसान

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जयपुर

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Rakhi Hajela

Jul 26, 2020

क्यों गिरे चने के दाम, क्यों भटक रहे किसान

क्यों गिरे चने के दाम, क्यों भटक रहे किसान

प्रधानमंत्री अन्नदाता आय सरंक्षण अभियान नाम से भले ही यह किसानों को हित को दर्शाने वाली योजना हो लेकिन इस योजना के नियमों के चलते प्रदेश के किसान चने की खरीद के लिए सड़क पर उतरने पर मजबूर हो गए हैं। 11 अक्टूबर 2018 को केंद्र सरकार की ओर से खाद्यान्न के आयात के लिए तैयार की गई मार्गदर्शिका के तहत इस योजना को भी मूर्तरूप दिया गया था। इसमें राज्य के उत्पादन से में 25 फीसदी से अधिक खरीद पर प्रतिबंध लगा दिया गया साथ ही 25 फीसदी से अधिक की खरदी की अनुमति के अधिकार कृषि मंत्री, खाद्य मंत्री और केंद्रीय वित्त मंत्री को सौंप कर योजना के परोक्ष रूप से अनुमति की प्रक्रिया को इतना जटिल बना दिया गया कि योजना अब किसानों के लिए सिरदर्द बन कर रह गई है। नाम से तो अन्नदाता किसानों की आय के सरंक्षण के लिए अभियान चलाने का आभास दिया गया है लेकिन वास्तविकता में खाद्यान्न की खरीद की मात्र को प्रतिबंधित कर कुल उत्पादन में से 75 फीसदी उपजों को खरीद की परिधि से बाहर कर दिया गया है और किसानें की आय पर कुल्हाड़ी चलाई गई है।

जानकारी के मुताबिक देश में अभी कुल उपजों की संख्या 115से अधिक है लेकिन केवल 22 कृषि उपजों के न्यूनतम

समर्थन मूल्य ही घोषित किए जाते हैं। आपको बता दें कि किसानों की आवाज को आधार बनाकर 14 अक्टूबर 2014 को

मूल्य समर्थन योजना की मार्गदर्शिका तैयार की गई थी जिसमें तिलहन, दलहन, कपास की उपजों की राज्य के कुल उत्पादन में से सामान्यतया 25 फीसदी की खरीद का प्रावधान किया गया। इससे अधिक खरीद के लिए केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय से अनुमति लेकर ही खरीद की जा सकती है। वर्ष 2018 में राजस्थान में चने का 18.33 लाख टन उत्पादन हुआ जिसमें से खरीद की स्वाकृत मात्रा केवल 4 लाख टन थी। मुख्यमंत्री की ओर से केंद्रीय कृषि मंत्री को इस संबंध में पत्र लिखकर स्वीकृत मात्रा बढ़ाने का अनुरोध किया गया तब 5 लाख 88 हजार 580 टन खरीद की स्वीकृति मिल सकी। इसके बाद प्रधानमंत्री अन्नदाता आय सरंक्षण अभियान लागू हो जाने के कारण अब किसानों को परेशान होना पड़ रहा है। इस बार भी किसान चने की 25 फीसदी खरीद सीमा को बढ़ाए जाने की मांग कर रहे हैं लेकिन केंद्र सरकार से अब तक इसकी स्वीकृति नहीं मिल सकी है।

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यहां भी किया गया भेदभाव

आपको बता दें कि सरकार ने यह प्रतिबंध केवल तिलहन दलहन और कपास की उपजों पर ही लगाया। इसलिए गेंहू और

धान की खरीद कुल उत्पादन में से 85 फीसदी तक होती है। यह दोनों खाद्यान्न की उपजें हैं। जिन्हें उत्पादक भी अपने परिवार के उपयोग के लिए भी सुरक्षित रखता है जबकि दलहन और तिलहन और कपास की उपजों में से खाद्यान्नों की तुलना में कम मात्रा में अपने पास रखता है। इनमें से चना अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रह पाता क्योंकि नमी आने के कारण उनमें घुन लगने की संभावना रहती है।

आयात और खरीद का परस्पर संबंध

2014 के बाद आयात की मात्रा में बढ़ोतरी की गई साथ ही देश की जरूरत से अधिक दालों का आयात भी किया गया। आइर नजर डालते हैं कुछ सारणियों पर जिनसे बात स्पष्ट रूप से समझ आ जाएगी।

दलहन का आयात

वर्ष मात्रा लाख टन में राशि हजार करोड़ में

2008-09 24.6 6.2

2009-10 35.6 9.8

2010-11 27.0 7.1

2011-12 33.6 8.9

2012-13 38.3 12.4

2013-14 35.3 12.4

2014-15 45.7 17.0

2015-16 58.2 25.6

2016- 17 56.3 18.8

2018- 19 25.7 8.2

कुल योग 446.4 1,55,000

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चना और पीली मटर का आयात

वर्ष चना आयात मात्रा लाख टन में पीली मटर आयात मात्रा लाख टन में

2008-09 2.0 12.2

2009-10 3.4 16.6

2010-11 1.0 15.0

2011-12 2.1 20.4

2012-13 7.0 13.7

2014-15 2.8 13.3

Rakhee Hajela, [26.07.20 14:46]
2015-16 10.3 22.5

2016-17 10.8 31.7

2017-18 9.8 28.8

2018-19 1.9 8.5

कुल योग 55.3 202.2

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उत्पादन और आयात

वर्ष उत्पादन लाख टन में आयात लाख टन में

2013-14 19.25 -

2014-15 17.3 3.17

2015-16 16.35 5.8

2016-17 23.13 6.6

2017-18 25.42 5.6

2018-19 23.22 2.527

स्त्रोत: सीएसीपी की रिपोर्ट से।

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कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

केंद्र सरकार के खाद्य उपभोक्ता मंत्री ने 9 जुलाई को लोकसभा में कहा कि 2018-19 में दालों का आयात नहीं होगा लेकिन सरकार ने दालों के आयाता की अनुमति दे दी। मोजाम्बिक से लिखित समझौता किया।

: अप्रेल 2018 में केंद्र सरकार ने अरहर की दाल पर 2 लाख टन और अन्य दालों पर 4 लाख टन के आयात पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन व्यापारियों ने इस पर कोर्ट से स्थगन आदेश ले लिए।

: केंद्र सरकार ने फिर से 2 लाख टन तुअर, 1.50 लाख टन मूंग, उड़द और पीली दाल के आयात पर प्रतिबंध तब लगाया जबकि व्यापारियों ने इनका भंडारण कर लिया था।

: देश में दलहन उत्पादन वर्ष 2013-14 में 19.25 लाख टन, 2014-15 में 17.3 लाख टन हुआ। 2015-16 में उत्पादन कम हुआ। 2016-17 में 23.13 लाख टन, 2017-18 में 25.42 लाख टन ओर 2018-19 में 23.22 लाख टन दलहन का उत्पादन हुआ। इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि 4 सितंबर 2016 को एक लाख 76 हजार टन दालों का आयाता अनुबंध 104 रुपए प्रति किलो की दर से हुआ। जिसमें से 36 हजार टन दाल बंदरगाह पहुंची ओर केंद्र सरकार ने उन्हीं दालों में से अरहर 66 रुपए और उड़द 82 रुपए प्रति किलो पर देने का प्रस्ताव राज्यों को दिया। उनमें से देश के पांच राज्यों ने ही सात हजार टन दाल प्राप्त की। फिर केंद्र सरकसर ने 23 मई 2016 को उन्हीं दालों को खुले बाजार में 55 रुपए प्रति किलो बेचने का निर्णय लिया।

बिचौलियों की मौज
दालों के थोक और खुदरा मूल्यों में वर्ष 2011-12,2012-13, 2013-14 में अंतर क्रमश: 13 रुपए, 14 रुपए और 18 रुपए प्रति किलो रहा। जबकि वर्ष 2014-15 और 2015 -16 में यह अंतर क्रमश: 38 रुपए और 57 रुपए प्रति किलो पहुंच गया। यानी साल 2011-12, 2012-13, 2013-14 में 5 किलो का अंतर 2014-15 और 2015-16 में 20 किलो पहुंच गया।

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