
World Kindness Day: अकेलेपन को दूर कर अपनेपन का करा रहे अहसास
World Kindness Day: जयपुर। दया धर्म का मूल है...। यानी, दया को धर्म का मूल माना गया है। इतना ही नहीं, महाभारत में भी दया को सबसे बड़ा धर्म बताया गया है। आज विश्व दया दिवस है। आधुनिकता की इस जिन्दगी में राजधानी जयपुर में कुछ लोग दया, सेवा करके अपना जीवन सुकुन से गुजार रहे है। दया का यह भाव न केवल उनको शांति प्रदान कर रहा है, बल्कि एक आत्मिक सुख भी दे रहा है। इसी दया भाव ने लोगों को समाज सेवा और बुजुर्ग सेवा से जोड़ दिया। इतना ही नहीं ये लोग अन्य को प्रेरणा भी दे रहे है। वहीं दया भाव ने ही कुछ लोगों को सवाजसेवी और परोपकारी बना दिया।
भारतीय सनातन धर्म के मूल में दया
गलतापीठाधीश्वर स्वामी अवधेशाचार्य का कहना है कि दया करना मनुष्य का धर्म है और उसे करनी भी चाहिए। दया भारतीय सनातन धर्म के मूल में रही है। दसलक्षणो में एक लक्षण क्षमा भी है, क्षमा तभी हृदय में आती है, जब उसमें दया का भाव आता है। दया का भाव हमारे शास्त्रों में भी निहित है।
अनाथालयों, वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों के बीच गुजार रहे जीवन
राजधानी जयपुर की करीब 60 महिलाओं ने इसी दया के चलते बेसहरा बुगुर्गों का सहारा बनने की ठानी, आज ये महिलाएं शहर के अनाथालयों, वृद्धाश्रमों में जाकर बुजुर्गों के बीच जीवन गुजार रही है। अनाथालयों, वृद्धाश्रमों में हर त्योहार, पर्व मना रही है। फाल्गुन माह में जहां इन अनाथालयों, वृद्धाश्रमों में फागोत्सव का आयोजन हो रहा है, वहीं अगस्त के माह में नंदोत्सव मनाया जाता है। राधाअष्टमी पर सत्संग का आयोजन हो रहा है। इन आयोजनों में ये महिलाएं बेसहारा बुजुर्गों के बीच अपनों के जैसे उत्सव मनातीं हैं। बेसहारा बुजुर्गों की सेवा के लिए इन महिलाओं ने अग्रवाल सामाजिक महिला ग्रुप भी बना रखा है।
बुजुर्गों का मिल रहा स्नेह और आशीर्वाद
ग्रुप सदस्य गौरी गर्ग का कहना है कि अनाथालयों, वृद्धाश्रमों में रह रहे बेसहारा बुजुर्गों को पारिवारिक माहौल देना ही हमारा उद्देश्य है। हर उत्सव इन बुजुर्गों के बीच जाकर मना रहे है। चाहे फागोत्सव हो, राधाअष्टमी पर सत्संग हो या नंदोत्सव, नियमित रूप से हर साल इन बुजुर्गों के बीच जाकर मना रहे है। इससे मन को बहुत सुकुन मिलता है, साथ ही बुजुर्गों का स्नेह और आशीर्वाद पाकर जीवन की हर कठिनाई भी दूर हो रही है।
बुजुर्ग सेवा बन गया दिनचर्या का हिस्सा
चित्रा अग्रवाल कहती हैं कि बुजुर्गों, गरीबों की सेवा करने से हमें काफी खुशी मिलती है। अनाथालयों, वृद्धाश्रमों में बुजुर्ग महिलाओं को खाना खिलाना, हर व्रत—त्योहार उनके बीच मनाना अब हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। हमनें कोविड के दौरान भी इन अनाथालयों, वृद्धाश्रमों में सेवाभाव जारी रखा। उनका आशीर्वाद ही हमारे लिए सुख—समृद्धि दे रहा है।
इंसानों के साथ बेजुबान पशु—पक्षियों के लिए भी कर रहे काम
श्रुति अग्रवाल का कहना है कि जरूरतमंद इंसान की मदद करना ही दया है। हमारा ग्रुप जरूरतमद लोगों को हर वस्तुएं उपलब्ध करा रहा है। बच्चों को पढ़ाई में मदद करने से लेकर बालिकाओं को विवाह पर उपहार स्वरूप घरेलू सामान देना, गोशालाओं में गायों को चारे—पानी की व्यवस्था करना आदि काम नियमित रूप से किए जा रहे है। इंसानों के साथ बेजुबान पशु—पक्षियों के लिए भी हम नियमित काम कर रहे है।
दया पर किसने क्या कहा....
दया धर्म का मूल है — संत तुलसी दास
दया सबसे बड़ा धर्म है — महाभारत
दया मनुष्य का स्वभाविक गुण है — प्रेमचंद
जहां दया तहं धर्म है — कबीरदास
दया दिवस पर एक नजर
— 13 नवम्बर को मनाया जाता है दया दिवस
— साल 1998 में विश्व दयालुता दिवस की हुई शुरुआत
— काइंडनेस मूवमेंट संगठन ने की शुरुआत
हर जीव के प्रति रखें दया का भाव
इसी दया भाव के चलते शहर में कई समाजसेवी आज भी परोपकार के काम में जुटे हुए है। इसी सेवाभाव के चलते कोविड जैसी महामारी के बीच भी लोगों ने शहर में लंगर लगाए, जरूरतमंद लोगों तक राशन पहुंचाया। ऐसे ही समाजसेवी रवि नैय्यर का कहना है कि हर व्यक्ति के अंदर सेवा भाव होता है, उसे जगाने की जरूरत है। जरूरी नहीं की सेवा से आपको धन मिले, इससे जीवन में निरोगता, घर में सुख शांति आती है, वहीं संकट काल टलता है। हमारे ग्रंथ कहते हैं कमाई का 10वां हिस्सा निकालना चाहिए और यह सेवा कार्य में लगाना चाहिए। जरूरी नहीं कि आप लंगर ही लगाओ, पशु—पक्षियों के लिए भी इसे काम में लिया जा सकता है। हर जीव के प्रति लोगों को दया का भाव रखना चाहिए।
Published on:
13 Nov 2022 05:20 pm
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