
तपते थार में जहां जीवन कठिन होता है, वहीं इंसानियत की सबसे खूबसूरत मिसाल मिलती है - प्याऊ। ये केवल पानी पीने का स्थान नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण की मिसाल हैं, जो वर्षों से बिना किसी प्रचार के प्यास बुझाने का नेक कार्य करती आ रही हैं। सदियों पुरानी इस परंपरा की शुरुआत मिट्टी के घड़ों से हुई थी। गांव-ढाणियों से लेकर शहर की गलियों तक, हर नुक्कड़ पर कोई न कोई ऐसा स्थान जरूर होता जहां मुसाफिर को बिना पूछे पानी मिल जाए। समय के साथ साधन बदले, अब ये प्याऊ स्टील टंकियों, ड्रम्स और वाटर कैंपर के रूप में दिखाई देते हैं, लेकिन सेवा का भाव वही है - निस्वार्थ। गर्मी के महीनों में जब पारा 45 डिग्री से ऊपर चला जाता है, तब ये प्याऊ राहगीरों के लिए जीवनदायी बन जाते हैं। इन प्याऊ की देखरेख समाजसेवियों, व्यापारियों और स्थानीय नागरिकों द्वारा की जाती है। कोई ठंडा पानी भरवाता है, तो कोई दिन में दो बार साफ-सफाई कर इसे चालू हालत में बनाए रखता है।
प्याऊ की खास बात ये है कि इनमें सेवा का कोई भेदभाव नहीं होता। कोई जात-पात या धर्म नहीं देखा जाता - जो आए, उसका स्वागत ठंडे पानी से होता है। कई बार यह भी देखने को मिला है कि लोग अपने घर के बाहर प्याऊ रखकर खुद निगरानी करते हैं कि कोई राहगीर प्यासा न लौटे। वाहन चालक आइदानसिंह का कहना है कि वह रोज 8-10 प्याऊ से गुजरते हैं। कई बार तेज धूप में जब शरीर जवाब देने लगता है, तो प्याऊ का एक घूंट ठंडा पानी नई ऊर्जा दे देता है। ये छोटे-छोटे काम असल में बड़ी सेवा हैं। समाजसेवी शंकरलाल का कहना है कि उनके परिवार ने वर्षों से हर गर्मियों में एक अस्थायी प्याऊ की जिम्मेदारी ली हुई है। संतोष मिलता है कि किसी की प्यास हमारे कारण बुझती है।
Published on:
15 Apr 2025 10:09 pm

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