
प्रवासी पक्षी कुरजां को रास आ रही मरुप्रदेश की आबोहवा।
जैसलमेर. स्वर्णिम धोरों, ऐतिहासिक दुर्ग और ऊंट सफारी के लिए प्रसिद्ध जैसलमेर अब प्रकृति पर्यटन, जैव विविधता संरक्षण और वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में अपनी पहचान और मजबूत कर रहा है। प्रवासी पक्षियों की बढ़ती मौजूदगी ने थार के मरुस्थल को देश के उभरते मरुस्थलीय बर्डिंग स्थलों में प्रमुख स्थान दिलाया है। अक्टूबर से मार्च के बीच साइबेरिया, मंगोलिया, कजाकिस्तान, रूस और मध्य एशिया तथा उत्तरी यूरेशिया से हजारों प्रवासी पक्षी जैसलमेर पहुंचते हैं। यह क्षेत्र सेंट्रल एशियन फ्लाईवे का महत्वपूर्ण शीतकालीन पड़ाव माना जाता है। डेजर्ट नेशनल पार्क और आसपास का मरुस्थलीय परिदृश्य खुले रेतीले मैदानों, प्राकृतिक घासभूमियों और मौसमी जल स्रोतों के कारण पक्षियों के लिए अनुकूल आवास उपलब्ध कराता है। वैज्ञानिक सर्वेक्षणों और बर्ड चेकलिस्ट के अनुसार जैसलमेर के मरुस्थलीय परिदृश्य में 300 से अधिक पक्षी प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं, जिससे यह राजस्थान के प्रमुख पक्षी आवासों में शामिल होता है।
गोडावण संरक्षण के क्षेत्र में भी जैसलमेर की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। वर्ष 2025 की वैज्ञानिक गणना में 198 गोडावण दर्ज किए गए, जिनमें लगभग 130 प्राकृतिक आवासों में पाए गए, जबकि शेष संरक्षण प्रजनन केंद्रों में दर्ज हुए। संरक्षण कार्यक्रम ने वर्ष 2026 में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। जून 2026 तक संरक्षण प्रजनन केंद्रों में गोडावणों की संख्या 94 बताई जा रही है। जैसलमेर में कुरजां यानी डेमोइजेल क्रेन, मैक्वीन्स बस्टर्ड, स्टेपी ईगल, इम्पीरियल ईगल, लैगर फाल्कन, इजिप्शियन वल्चर, सैंडग्रोस, डेजर्ट लार्क और बी-ईटर सहित अनेक पक्षी प्रजातियां प्रवास में आती है। अनुकूल वर्षों में फ्लेमिंगो प्रजातियों की उपस्थिति भी दर्ज की जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार मानसून के बाद बनने वाले जल स्रोत, प्राकृतिक घासभूमियां और पर्याप्त भोजन उपलब्धता इस क्षेत्र को प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित शीतकालीन आवास बनाते हैं। हालांकि हाई-टेंशन बिजली लाइनें, आद्र्रभूमियों पर दबाव, अनियंत्रित पर्यटन, घासभूमियों का सिकुडऩा और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां अभी भी संरक्षण के सामने मौजूद हैं।
एक्सपर्ट व्यू
पश्चिमी राजस्थान में प्रवासी पक्षियों की बढ़ती संख्या आद्र्रभूमियों के विकास, बेहतर वर्षा और संरक्षण प्रयासों का परिणाम है। ये पक्षी पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इको-टूरिज्म के माध्यम से स्थानीय आजीविका के अवसर भी बढ़ाते हैं।
— डॉ. सुमित डूकिया, वरिष्ठ वन्यजीव विशेषज्ञ एवं प्रोफेसर, गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, दिल्ली
प्रवासी पक्षियों के संरक्षण में स्थानीय समुदायों और एनजीओ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जल स्रोतों का संरक्षण, पर्यावरण शिक्षा और वैज्ञानिक सहयोग के माध्यम से संरक्षण प्रयासों को मजबूती मिली है। सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और समुदाय का संयुक्त प्रयास ही इस जैव विविधता को दीर्घकाल तक सुरक्षित रख सकता है।
— डॉ. ममता रावत, वरिष्ठ वन्यजीव विशेषज्ञ एवं निदेशक, ईआरडीएस फाउंडेशन, जैसलमेर
Published on:
29 Jun 2026 08:08 pm
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