
बचा लो धरोहर को...गौरवमयी इतिहास का साक्षी, फिर भी सिसक रहा किला
सरहदी जिले के ऐतिहासिक सोनार दुर्ग को देश-दुनिया में खास पहचान मिल चुकी है, वहीं सरहदी जिले का एक किला ऐसा भी है जो इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए हैं, इसकी कलात्मक सुंदरता दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर देती है। बावजूद इसके इस प्राचीन किले को न संरक्षण मिल रहा है और न ही इसको बचाने के लिए किसी का ध्यान ही गया है। समय व मौसम की मार और जिम्मेदारों की अनदेखी से यह निराशाजनक स्थिति बनी है। गौरतलब है कि किले में शिल्पकारी, पत्थर के खंभों पर बेल बूटों की झलक, धार्मिक स्थल आदि मौजूद हैं। मौजूदा समय में सूरते हाल यह है कि यह ऐतिहासिक धरोहर नष्ट होती जा रही है। किले के भीतर भवन व दीवारें जर्जर हालत में हैं। धरोहर के संरक्षण के लिए कोई आगे नहीं आया है। सार-संभाल के अभाव में यह किला जर्जर हो रहा है।गौरतलब है कि जैसलमेर रियासत के इतिहास में लाठी ठिकाने का विशेष योगदान माना जाता है।
महारावल बैरीशाल ने बनवाया था कोट
जानकारों के अनुसार तत्कालीन महारावल बैरीशाल ने विक्रम संवत 1940 में लाठी कोट का निर्माण करवाया और जलाशय खुदवाया। कोट के अंदर देवी के थान की प्राचीर में जड़े गए पत्थर पर उत्कीर्ण लेख से इस बात की पुष्टि होती है। बताया जाता है कि ठा. छतरसिह ने गांव में बस्ती बसाने के लिए लोगों को भूमि आवंटित की उसके 10 रुपए वार्षिक लिए जाने का प्रावधान रखा गया। छतरसिंह के बाद खुशालसिंह लाठी की गद्दी पर बैठे। महारावल बैरीशाल की नि:संतान मृत्यु होने पर खुशालसिंह के पांच वर्षीय पुत्र कुंवर श्यामसिंह को जैसलमेर कि गद्दी पर आसीन किया गया । उस समय श्यामसिंह क्षेत्र नाम बदल कर शालिवाहन कर दिया गया।खुशालसिंह के पुत्र दानसिंह लाठी की गद्दी पर बैठे। ठा. दान सिंह की मृत्यु विक्रम संवत 1979 में हुई। उनकी 6 स्तम्भों की छतरी लाठी कस्बे के बाहर बनी हुई है। यहां हर वर्ष वर्ष मेला लगता है। ठा. दानसिंह ने अपनी न्यायप्रियता एवं लोककल्याणकारी नीतियों से जनता के दिलों में विशेष जगह बनाई। आज भी उनका नाम बड़े आदर एवं सम्मान के साथ निया जाता है।
Published on:
11 Apr 2024 10:54 pm

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