मई की तपती दोपहरें, आसमान से बरसती आग और रेत पर नंगे पांव जलते अनुभव — रेगिस्तान की गर्मी का अहसास वही कर सकता है जो यहां जीता है।
मई की तपती दोपहरें, आसमान से बरसती आग और रेत पर नंगे पांव जलते अनुभव — रेगिस्तान की गर्मी का अहसास वही कर सकता है जो यहां जीता है। इस भीषण लू के बीच भी जैसलमेर के बुजुर्ग न केवल सुकून से जीते हैं, बल्कि अपनी परंपरागत समझदारी से आज की पीढ़ी को भी रास्ता दिखाते हैं।
रामगढ़ के 82 वर्षीय छोगाराम बताते हैं कि हम धूप से भागते नहीं, उससे तालमेल बैठाते हैं। दोपहर का समय आराम के लिए होता है, खेत-बाड़ी या काम सुबह-सुबह या शाम को ही करते हैं। वे आज भी दोपहर में घर के भीतर मिट्टी की दीवारों वाली झोंपड़ी में बिना कूलर के ठंडी हवा महसूस करते हैं।
पोकरण की 75 वर्षीय गीवर काकी कहती हैं, आजकल सब फ्रिज का पानी पीते हैं, लेकिन लू में राहत चाहिए तो तांबे के घड़े का पानी ही सबसे बढिय़ा। वह बेल का शरबत, छाछ और आम पना जैसे देसी पेयों को गर्मियों का सबसे कारगर उपाय मानती हैं।
परंपरागत पहनावा बना ढाल
गर्मी में बुजुर्ग हमेशा ढीले और हल्के कपड़े पहनते हैं। पुरुष पगड़ी को लू से बचाव के लिए ढाल बनाते हैं तो महिलाएं पूरे शरीर को ढकने वाली चुनरियों का उपयोग करती हैं। ये केवल परंपरा नहीं, बल्कि मौसम से जूझने की वैज्ञानिक समझ का हिस्सा हैं।
जैसलमेर शहर के भीतर सोनार दुर्ग में रहने वाले बुजुर्ग बताते हैं कि पुराने घरों की बनावट ऐसी है कि धूप सीधे भीतर नहीं आती। मोटी पत्थर की दीवारें और हवादार झरोखे गर्मी को भीतर घुसने नहीं देते।
कई बुजुर्गों को यह चिंता भी है कि अब लोग एसी-कूलर पर निर्भर हो गए हैं, जबकि पुराने तरीके आज भी कम खर्च में ज्यादा राहत देते हैं। लू से बचने के लिए जल सेवा, पेड़ों की छांव और ठंडी चीजें बांटने की संस्कृति भी अब कम होती जा रही है।