
ब्रह्मदेव वर्मा को आज भी याद है वो जेल पर झंडा फहराना, 9 महीने ऐसे सही थी अंग्रेजों की यातना
जौनपुर. देश को आजाद कराने में वैसे तो कई सपूतों ने अपने प्राण की आहुति दी। अनगिनत देश के लाल हंसते हुए सूली पर चढ़ गए। इन रण बाकुरों में से एक जमैथा गांव निवासी ब्रह्मदेव वर्मा भी हैं। वे आज भी गुलामी में जकड़े उस देश को देख को याद करते हैं तो सच्चे सपूतों की कुर्बानी भी उन्हें याद आती है। हालांकि इनको याद करने की जहमत शासन प्रशासन सिर्फ 15 अगस्त या 26 जनवरी को ही उठाता है। इसके बाद फिर उपेक्षित छोड़ देता है।
17 साल की उम्र में ही ब्रह्मदेव वर्मा स्वतंत्रता के लिए मुखर हो गए थे। 12 अगस्त 1942 को छात्रों के साथ वे भी जेल के मुख्य द्वार पर तिरंगा फहराने पहुंच गए थे। यहां आजादी के दिवानों ने झंडा लगाने का प्रयास किया तो पुलिस से संघर्ष हो गया। फायरिंग और लाठी चार्ज किया गया। इस घटना में कई मतवाले शहीद भी हुए। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे दिवाकर सिंह समेत कई लोग घायल भी हुए थे। हालांकि दो दिन बाद ब्रह्मदेव वर्मा समेत कई लोगों को पुलिस ने पकड़ लिया।
इसके बाद सभी को जेल में डाल दिया गया। 9 महीने तक जेल में ब्रिटिश हुकूमत की यातना झेलते रहे। आजादी के बाद सरकार ने श्री वर्मा को स्वंत्रता संग्राम सेनानी का सम्मान दिया। सौ बरस की उम्र पार कर चुके श्री वर्मा को जब भी आजादी की लड़ाई याद आती है तो उत्सुक हो उठते हैं।
कंपते लेकिन जोश भरे शब्दों में उस एक-एक पल का दृष्य खींच देते हैं जो इन जैसे लोगों ने देखा था। वे बताते हैं कि, जेल में अंग्रेजी हुकूमत उनका हौसला तोड़ने की पूरी कोशिश करती। न जाने कितनी रात सोने नहीं दिया जाता था। आजादी के दिवानों को अपने साथ मिलाने के लिए साम, दाम, दंड व भेद के हथकंडे अपनाए जाते। लेकिन हमारे हौसले नहीं टूटे। आंखों में बस एक ही ख्वाब था, भारत माता को जंजीरों से आजाद दिलाने का।
जावेद अहमद
Published on:
23 Jan 2018 12:56 pm

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