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परिवार को बचाए रखने के लिए धैर्य व संयम जरूरी

- भागवत कथा में धू्रव चरित्र का वर्णन किया

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परिवार को बचाए रखने के लिए धैर्य व संयम जरूरी

झाबुआ. गोवर्धननाथ की हवेली में चल रहे १५१वें पाटोत्सव के तहत चल रही भागवत कथा के दूसरे दिन पं. सतीश शर्मा शास्त्री ने धू्रव चरित्र का वर्णन किया।

उन्होंने कहाकि किसी भी स्थान पर बिना निमंत्रण जाने से पहले इस बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए कि जहां आप जा रहे हैं। वहां आपका, अपने इष्ट या अपने गुरु का अपमान न हो। यदि ऐसा होने की आशंका हो तो उस स्थान पर नहीं जाना चाहिए। फिर चाहे वह स्थान अपने जन्मदाता पिता का ही घर क्यों न हो। उन्होंने कथा में उत्तानपाद के वंश में ध्रुव चरित्र की कथा सुनाते हुए बतायाकि धु्रव की सौतेली मां सुरुचि द्वारा अपमानित होने पर भी उसकी मां सुनीति ने धैर्य नहीं खोया, जिससे एक बहुत बड़ा संकट टल गया। परिवार को बचाए रखने के लिए धैर्य व संयम की नितांत आवश्यकता रहती है।

शास्त्रीजी ने बताया किस तरह भक्त धु्रव ने तपस्या कर श्री हरी को प्रसन्न किया। उन्होंने कहा भक्ति के लिए उम्र की बाधा नहीं होती। बच्चों को बचपन में ही भक्ति करने की प्रेरणा देनी चाहिए। क्योंकि बचपन कच्ची मिट्टी की तरह होता है। उससे जैसा चाहे वैसा पात्र बनाया जा सकता है। पाप के बाद कोई व्यक्ति नरकगामी हो, इसके लिए श्रीमद् भागवत में श्रेष्ठ उपाय प्रायश्चित बताया है। ध्रुव के चरित्र के बारे में कहाकि भगवान की भक्ति के प्रभाव से धू्रव को इस लोक में भी सफलता मिली और परलोक में भी ऐसा पद मिला जो आज तक किसी को नहीं मिला। ध्रूव ने वन में निराहार रहकर भजन किया। भजन में जो रस आता है और वो शक्ति मिलती है। जो भोजन से नहीं मिलती। जब हम भगवान के रास्ते पर चलते हैं तो वह स्वंय हमारी संभाल करते हैं। धु्रव को भी नारदजी मिल गए और उन्होंने बिना मांगे दीक्षा दी। सच्ची शांति और सुख केवल भगवद् भजन में हैं। श्रीमद भागवत कथा के दौरान स्वयं गोस्वामी दिव्येशकुमार उपस्थित रहे । कथा के अंत में महामंगल आरती कर प्रसादी वितरित की गई।