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BSP के हैं ये मजबूत गढ़, इन्हें जीतने की कोशिश करेगी सपा, भाजपा, कांग्रेस

बुंदेलखंड के ललितपुर जिले की महरौनी और ललितपुर सीट पर बहुजन समाज पार्टी ने अपनी पकड़ मजबूत बना रखी है

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Ruchi Sharma

Sep 30, 2016

UP elections

UP elections

झांसी. बुंदेलखंड के ललितपुर जिले की महरौनी और ललितपुर सीट पर बहुजन समाज पार्टी ने अपनी पकड़ मजबूत बना रखी है। पार्टी सुप्रीमो मायावती की चुनावी रणनीति के चलते बीएसपी ललितपुर सीट से तीन चुनाव और महरौनी सीट से लगातार दो चुनाव जीत चुकी है। ऐसे में अब समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की नजर इन सीटों पर है। तीनों ही दल यहां बसपाई हाथी को पछाड़ने के लिए समीकरण बनाने में जुट गए हैं।

ललितपुर सीट पर तीन चुनाव जीत चुकी है बीएसपी

ललितपुर विधानसभा सीट पर बीएसपी लगातार तीन चुनाव जीत चुकी है। 2007 के चुनाव में यह सीट बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस से छीनी थी। बसपा ने यहां जातीय समीकरणों को साधते हुए इंजीनियर नाथूराम कुशवाहा को चुनाव मैदान में उतारा। उनका मुकाबला हुआ समाजवादी पार्टी के वीरेंद्र सिंह बुंदेला से। इस चुनाव में नाथूराम कुशवाहा ने जीत के साथ अपनी राजनीतिक पारी शुरू की। हालांकि, बीच में ही उनका निधन हो जाने के बाद यह सीट खाली हो गई।

इस पर बसपा सुप्रीमो ने 2009 में हुए उपचुनाव में इंजीनियर नाथूराम कुशवाहा की पत्नी सुमन कुशवाहा को चुनाव मैदान में उतारा। उन्होंने जीत के साथ ही अपने पति की राजनीतिक विरासत संभाली। इसके बाद वर्ष 2012 में बसपा सुप्रीमो ने सुमन कुशवाहा के बजाए कुशवाहा बिरादरी के ही रमेश को मैदान में उतारा और उनका यह दांव भी कामयाब रहा। रमेश कुशवाहा बसपा के टिकट पर विधायक चुने गए। अब एक बार फिर बसपा सुप्रीमो ने यहां से टिकट बदल दिया है। इस बार संतोष कुशवाहा को टिकट दिया गया है। उधर, टिकट कटने से क्षुब्ध रमेश कुशवाहा ने भाजपाई दामन थाम लिया है।

महरौनी सीट दो बार जीत चुकी है बसपा

इसी तरह महरौनी विधानसभा सीट भी बहुजन समाज पार्टी लगातार दो बार जीत चुकी है। 2007 के चुनाव में पार्टी के रामकुमार तिवारी विजयी रहे थे। इसके बाद 2012 के चुनाव में परिसीमन के बाद यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दी गई। इसलिए यहां पर पार्टी ने फेरन लाल पर दांव आजमाया। उन्होंने इस सीट को बहुजन समाज पार्टी के खाते में बरकरार रखा। इस बार भी पार्टी ने फेरन लाल को चुनाव मैदान में उतारने की घोषणा की है। अब देखना है कि बीएसपी की इस चुनौती को विरोधी तोड़ पाते हैं या नहीं।